Hindi Subjective Model Paper 2022 Bihar Board

Matric Subjective Hindi Model Paper Download 2022 | class 10th Hindi Subjective Model Paper Download 2022 PDF

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Bihar Board Matric Model Paper -3 2022

खण्ड-ब/SECTION-B
गैर-वस्तुनिष्ठ प्रश्न/Non-Objective Type Questions

1. निम्नलिखित गद्यांशों में से किसी एक गद्यांश को पढ़कर नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर दें । प्रत्येक प्रश्न दो अंकों का होगा।

(क) महात्मा गाँधी ने आज से 30-35 वर्ष पूर्व बुनियादी शिक्षा का आंदोलन शुरू किया था। उसमें उन्होंने राष्ट्र के लिए कई प्रकार की प्रारंभिक
शिक्षा का प्रस्ताव रखा था, जिसका केन्द्र शारीरिक श्रम और उत्पादन कार्य था और जिसका सामुदायिक जीवन से घनिष्ठ सम्बन्ध था। भारतीय शिक्षा के इतिहास में उसका महत्त्वपूर्ण स्थान था। वह एक शिक्षा के प्रति क्रांति थी जो भारत में कई सालों के अंग्रेजी शासन में परम्परागत प्रणाली पर बनी थी, जो अनुत्पादक और पुस्तकीय थी और जिसमें परीक्षाओं का महत्त्वपूर्ण स्थान था। बुनियादी शिक्षा से राष्ट्रीय चेतना जागृत हुई। हो सकता है कि उससे प्राथमिक अवस्था में शिक्षा के रूप में कोई आमूल परिवर्तन आया हो, किन्तु इतना अवश्य है कि एक अधिक बड़े क्षेत्र में शिक्षा-संबंधी विचार और व्यवहार पर गहरी छाप पड़ी । हमारा यह विश्वास है कि इस प्रणाली की मूल बातें तत्त्वतः ठीक हैं और थोड़े संशोधन से उन्हें हमारी शिक्षा-प्रणाली की न केवल प्राथमिक अवस्था पर अपितु सारी ही अवस्थाओं पर शिक्षा का अंग बनाया जा सकता है। ये तीन बातें इस प्रकार हैं :
(क) शिक्षा में उत्पादक कार्यकलाप, अर्थात्, कोई ऐसा विषय सिखाया जाय, जिससे छात्र कुछ कमाई भी करने योग्य हो सकें।
(ख) पाठ्यचर्या का उत्पादक कार्यकलापों और भौतिक तथा सामाजिक पर्यावरण से सह-संबंध और
(ग) स्कूल तथा स्थानीय जनसमुदाय से घनिष्ठ संबंध ।

प्रश्न:
(i) गाँधी जी ने किस शिक्षा का आन्दोलन शुरू किया था ?
(ii) सामाजिक जीवन से उसका कैसा संबंध था ?
(iii) अंग्रेजों द्वारा चलाई गई शिक्षा पद्धति कैसी थी ?
(iv) बुनियादी शिक्षा के क्या लाभ हैं ?
(v) बुनियादी शिक्षा पद्धति में मुख्य तीन बातें कौन-कौन हैं ?

उत्तर:
(i) गाँधी जी ने बुनियादी शिक्षा का आन्दोलन शुरू किया ।
(ii) सामाजिक जीवन से गाँधीजी का घनिष्ठ संबंध था ।
(iii) अंग्रेजों द्वारा चलाई गई शिक्षा पद्धति अनुत्पादक और पुस्तकीय थी।
(iv) बुनियादी शिक्षा से राष्ट्रीय चेतना जागृत हुई । शिक्षा संबंधी विचार और व्यवहार पर गहरी छाप पड़ी।
(v) बुनियादी शिक्षा पद्धति में निम्नलिखित मुख्य तीन बातें हैं-(क) शिक्षा में उत्पादक कार्यकलाप, अर्थात्, कोई ऐसा विषय सिखाया जाय, जिससे छात्र कुछ कमाई भी करने योग्य हो सकें। (ख) पाठ्यचर्या का उत्पादक कार्यकलापों और भौतिक तथा सामाजिक पर्यावरण से सह-संबंध और (ग) स्कूल तथा स्थानीय जनसमुदाय से घनिष्ठ संबंध ।

 

(ख) 21 अक्टूबर 1833 ई० को स्वीडन के स्टॉकहोम में पिता इमानुएल एवं माता कैरोलीन ऐनड्रिटा आलसिला के आंगन में अल्फ्रेड नोबेल का जन्म हुआ। वह शैशवावस्था से ही बहुत कमजोर थे । सर्दी-जुकाम से, बुखार से mहमेशा पीड़ित रहते थे । मन से भी वह भावुक थे । इन सबके बीच कुछ कर गुजरने का जज़्बा उनमें भरा था । उनके इसी जज्बे ने विश्व को डायनामाइट  दिया । एक बार टपक रही नाइट्रोग्लिसरीन पर उनकी नजर पड़ी जो टपकने के साथ रेत पर जमती जा रही थी । उन्होंने उसी के आधार पर डायनामाइट का आविष्कार कर दिया। उन्होंने अपने इस आविष्कार को पेटेंट करवाया। कारखाना खोलने के लिए अनेक देशों को पत्र लिखे परंतु खतरनाक विस्फोटक होने के कारण किसी ने सहायता नहीं की। अंततः फ्रांस के तत्कालीन सम्राट नेपोलियन तृतीय ने स्वीकृति दे दी । कालांतर में कई देशों में इसकी फैक्ट्रियाँ खुल गयीं । उससे उनके पास अकूत संपत्ति अर्जित हो गयी । अपनी मृत्यु से  पूर्व इन्होंने अपनी अपार धनराशि का बड़ा भाग 25 लाख पौंड की वसीयत पुरस्कारों के लिए निर्धारित कर दी । उनकी मृत्यु के पश्चात् 10 दिसंबर 1901 को उनकी बरसी पर पहली बार नोबेल फाउंडेशन ने पाँच पुरस्कार दिए । ये पुरस्कार भौतिक, रसायन, चिकित्सा, साहित्य व शांति के क्षेत्र में विशिष्ट कार्य करने वालों को दिये गए ।

प्रश्न :
(i) अल्फ्रेड नोबेल का जन्म कब और कहाँ हुआ ?
(ii) अल्फ्रेड नोबेल ने डायनामाइट का आविष्कार कैसे किया ?
(iii) अल्फ्रेड को कारखाना लगाने की अनुमति क्यों नहीं मिल पा रही थी ?
(iv) सर्वप्रथम डायनमाइट का कारखाना किस देश में खुला ?
(v) नोबेल पुरस्कार की शुरुआत कब हुई ? किन-किन क्षेत्रों में यह पुरस्कार दिए जाते हैं ?

उत्तर:
(i) अल्फ्रेड नोबेल का जन्म 21 अक्टूबर 1833 ई० को स्वीडन के स्टॉकहोम में हुआ था।
(ii) एक बार टपक रही नाइट्रोग्लिसरीन पर उनकी नजर पड़ी जो टपकने के साथ रेत पर जमती जा रही थी । उन्होंने उसी के आधार पर डायनामाइट का आविष्कार कर दिया ।
(iii) खतरनाक विस्फोटक होने के कारण अल्फ्रेड को डायनामाइटनिर्माण के लिए कारखाना लगाने की अनुमति नहीं मिल रही थी ।
(iv) सर्वप्रथम डायनमाइट का कारखाना फ्रांस में खुला ।
(v) नोबेल पुरस्कार की शुरुआत 10 दिसंबर 1901 को हुई । ये पुरस्कार भौतिक, रसायन, चिकित्सा, साहित्य व शांति के क्षेत्र में विशिष्ट कार्य करने वालों को दिये जाते हैं।

 

2. निम्नलिखित गद्यांशों में से किसी एक गद्यांश को पढ़कर नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर दें । प्रत्येक प्रश्न दो अंकों का होगा। 5x 2 = 10

(क) मनुष्य नाशवान प्राणी है । वह जन्म लेने के बाद मरता अवश्य है, अन्य लोगों की भाँति महापुरुष भी नाशवान हैं । वे भी समय आने पर अपना शरीर छोड़ देते हैं, पर वे मरकर भी अमर हो जाते हैं । वे अपने पीछे छोड़े गए कार्य के कारण अन्य लोगों द्वारा याद किये जाते हैं । उनके ये कार्य
चिरस्थायी होते हैं और समय के साथ-साथ परिणाम और बल में बढ़ते जाते हैं । ऐसे कार्य के पीछे जो उच्च आदर्श होते हैं, वे स्थायी होते हैं और बदली परिस्थितियों में नए वातावरण के अनुसार अपने को ढाल लेते हैं । संसार ने पिछली पच्चीस शताब्दियों से भी अधिक में जितने भी महापुरुषों को जन्म दिया है, उनमें गाँधीजी को यदि आज भी बड़ा नहीं माना जाता तो भी भविष्य में उन्हें सबसे बड़ा माना जाएगा क्योंकि उन्होंने अपने जीवन की गतिविधियों को विभिन्न भागों में नहीं बाँटा, बल्कि जीवनधारा को सदा एक और अविभाज्य माना । जिन्हें हम सामाजिक, आर्थिक और नैतिक के नाम से पुकारते हैं, वे वास्तव में उसी धारा की उपधाराएँ हैं, उसी भवन के अलग-अलग पहलू हैं। गाँधीजी ने मानव-जीवन के इस नव कथानक की व्याख्या न किसी हृदय को स्पर्श करनेवाले वीर काव्य की भाँति की और न किसी दार्शनिक महाकाव्य की भाँति ही । उन्होंने मनुष्य की आत्मा में अपने को निम्नतम रूप में उचित कार्य करने के प्रति निष्ठा, किसी ध्येय की पूर्ति के लिए सेवा और किसी विचार के प्रति स्वार्पण के बीच सतत चलनेवाले संघर्ष के नाटक की भाँति माना है। उन्होंने सदा साध्य को ही महत्त्व नहीं दिया, बल्कि उस साध्य को पूरा करने के लिए अपनाए जाने वाले साधनों का भी ध्यान रखा । साध्य के साथ-साथ उसकी पूर्ति के लिए अपनाए गए साधन भी उपयुक्त होने चाहिए।

 प्रश्न:
(i) उपर्युक्त गद्यांश का एक समुचित शीर्षक दीजिए ।
(ii) सामान्य मनुष्य और महापुरुष में क्या अन्तर है ?
(iii) महापुरुषों को याद क्यों किया जाता है ?
(iv) गाँधीजी को भविष्य में सबसे बड़ा क्यों माना जाएगा ?
(v) गाँधीजी ने मानव-जीवन की व्याख्या किस प्रकार की थी?
उत्तर:
(i) शीर्षक-अमर महापुरुष ।
(ii) सभी जीव नाशवान हैं । सामान्य एवं महापुरुष दोनों का जन्म एवं मरण अवश्य होता है । साधारण मनुष्य के मरने के बाद उसका यशोगान नहीं होता है जबकि महापुरुष का यशोगान होता है । महापुरुष मरकर भी अमर होते
(iii) महापुरुषों द्वारा किया गया कार्य चिरस्थायी होता है । समय के साथ-साथ उनका प्रभाव बढ़ता है । उनका कार्य आदर्शों से प्रेरित होते हैं । अपनी कीर्ति के कारण वे याद किये जाते हैं ।
(iv) गाँधीजी ने अपने जीवन को गतिविधियों में नहीं बाँटा था । उन्होंने जीवनधारा को एक और अविभाज्य माना था । जीवन की गतिविधियों को
सामाजिक, आर्थिक और नैतिक भागों में बाँटना उनकी दृष्टि में उत्तम नहीं था । वे उन्हें एक ही जीवनधारा की उपधाराएँ मानते थे । इस नवीन दृष्टिकोण के कारण उन्हें भविष्य में सबसे बड़ा माना जाएगा ।
(v) गाँधीजी की मानव-जीवन की व्याख्या हृदय को छू लेनेवाली है। उन्होंने जीवन को सतत चलने वाला संघर्ष-नाटक माना था । किसी ध्येय की
पूर्ति के लिए तथा किसी विचार के प्रति स्वार्पण के बीच सतत संघर्ष चलता रहता है, ऐसा उनका विचार था ।

 

(ख) कृष्ण भक्ति परंपरा में राधा-कृष्ण को आराध्य मानकर बड़ी व्यापकता के साथ प्रेम तत्त्व की अभिव्यंजना की गई है । सूरदास ने कृष्ण
जन्म से लेकर उनके मथुरा जाने तक की कथा विस्तार से प्रस्तुत की है । उन्होंने कृष्ण के बाल सुलभ भावों और क्रीड़ाओं का सहज एवं स्वाभाविक चित्र प्रस्तुत किया है । उन्होंने ‘सूरसागर’ में वात्सल्य रस की धारा बहा दी है । सूर ने बाल क्रीड़ाओं और वात्सल्य से पूर्ण माता-पिता के प्रेम का निश्छल चित्र प्रस्तुत किया है । इन चित्रणों में सूर का प्रेम छलक-छलक पड़ा है । सूर एवं अन्य कृष्ण भक्त कवियों की रचनाओं में ही स्त्री-पुरुष के
    संबंधों के चित्रण में इतना खुलापन मिलता है । सूर के पूर्व सिद्ध, नाथ एवं संत कवियों ने स्त्री को माया का प्रतिरूप तथा संसार की सारी बुराइयों की खान कहा था। तुलसीदास भी प्रायः स्त्री के प्रति यही धारणा रखते हैं । हमारे मन में प्रायः यह प्रश्न उठता है कि सूरदास के काव्य में स्त्री-स्वाधीनता और स्त्री-पुरुष के संबंधों में इतनी स्वच्छंदता का आगमन कैसे हो गया जबकि उनके पूर्व के कवियों में ऐसी परंपरा नहीं मिलती । कुछ इतिहासकारों ने ब्रजप्रदेश में अमीरों की उपस्थिति को इसका आधार माना है तथा पशुचारण सभ्यता के अवशेष के रूप में इसकी व्याख्या की है । उनकी मान्यता है किअमीरों के समाज में स्त्री-पुरुष समान रूप से खेती और पशुपालन लेते थे । अभी पितृसत्तात्मक, सामंती समाज की मर्यादाओं तथा नैतिक विधि -निषेधों का दुराग्रह पैदा नहीं हुआ था । अतः, ब्रज क्षेत्र में राधा-कृष्ण की प्रेम-लीला के गीतों की परंपरा लोक संस्कृति में बहुत पुराने समय से चली आ रही थी । सूरदास उस परंपरा को अपनी प्रेमाभक्ति से परिष्कृत और मधुर रूप दे रहे थे । प्रसिद्ध आलोचक रामचंद्र शुक्ल इस तथ्य की चर्चा करते हैं कि सूर के आविर्भाव के पहले ही बैजू बावरा के भी ऐसे ही गीत प्राप्त होते हैं।

प्रश्न:
(i) उपर्युक्त गद्यांश का एक उपयुक्त शीर्षक दीजिए ।
(ii) ‘सूरसागर’ के रचयिता कौन हैं ? ‘सूरसागर’ में किसकी कथा वर्णित है?
(iii) किन चित्रणों में सूर का प्रेम छलक-छलक पड़ता है ?
(iv) नाथ, सिद्ध या संत कवियों ने अपनी-अपनी रचनाओं में स्त्री को किस रूप में चित्रित किया है ? में भाग लेकर कृष्ण
(v) सूर तथा अन्य कृष्णभक्त कवियों की रचनाओं में स्त्री-पुरुष संबंधों के चित्रण में खुलापन क्यों मिलता है ?

उत्तर:
(i) शीर्षक-सूर के काव्य में प्रेमानुभूति ।
(ii) ‘सूरसागर’ के रचयिता सूरदास हैं । ‘सूर सागर’ में कृष्ण जन्म से के मथुरा जाने की कथा वर्णित है।
(iii) सूरदास ने बालक कृष्ण के बाल सुलभ भावों और चेष्टाओं का बड़ा ही स्वाभाविक चित्र प्रस्तुत किया है । साथ ही, उन्होंने वात्सल्य से पूर्ण
कृष्ण के माता-पिता के प्रेम का निश्छल चित्रण किया है। इन दोनों चित्रणों में सूर का प्रेम छलक-छलक पड़ता है ।
(iv) नाथ, सिद्ध या संत कवियों ने अपनी-अपनी रचनाओं में स्त्री को माया के प्रतिरूप और सांसारिक बुराइयों की खान के रूप में चित्रित किया है।
(v) सूरदास तथा अन्य कृष्ण भक्त कवियों की रचनाओं में स्त्री-पुरुष संबंधों के चित्रण में खुलापन मिलता है । इसका मुख्य कारण है ब्रज की आभार संस्कृति जिसमें उस समय पितृसत्तात्मक सामंती समाज की मर्यादाओं तथा नैतिक विधि-निषेधों का दुराग्रह प्रारंभ नहीं हुआ था ।

 

3. निम्नलिखित में से किसी एक विषय पर दिए गए संकेत-बिन्दुओं के आधार पर लगभग 250-300 शब्दों में निबंध लिखें :
(क) भारतीय नारी

(ख) वर्षा ऋतु
(ग) जंगल
(घ) हमारे पड़ोसी
(ङ) वसंत ऋतु

उत्तर-

(क) भारतीय नारी

भारत की नारी का नाम सुनते ही हमारे सामने प्रेम, करुणा, दया, त्याग और सेवा-समर्पण की मूर्ति अंकित हो जाती है। जयशंकर प्रसाद ने नारी के

महत्त्व को यों प्रकट किया है।
नारी तुम केवल श्रद्धा हो,
विश्वास रजत नग पदतल में।
पीयूष स्रोत-सी बहा करो,
जीवन के सुंदर समतल में ॥

नारी के व्यक्तित्व में कोमलता और सुंदरता का संगम होता है । वह तर्क की जगह भावना से जीती है । इसलिए उसमें प्रेम, करुणा, त्याग आदि गुण
अधिक होते हैं। इन्हीं की सहायता से वह अपने तथा अपने परिवार का जीवन सुखी बनाती है।

उन्नत देशों की नारियाँ प्रगति की अंधी दौड़ में पुरुषों से मुकाबला करने लगी हैं। वे पुरुषों के समान व्यवसाय और धन-लिप्सा में संलग्न हैं। उन्हें
अपने माधुर्य, ममत्व और वात्सल्य की कोई परवाह नहीं है । अनेक नारियाँ माता बनने का विचार ही मन में नहीं लातीं। वे केवल अपने सुख, सौंदर्य और विलास में मग्न रहना चाहती हैं। भोग-विलास की यह जिंदगी भारतीय आदर्शों
के विपरीत है
                          भारतवर्ष ने प्रारंभ से नारी के महत्त्व को समझा है । इसलिए यहाँ नारियों की सदा पूजा होती रही है। प्रसिद्ध कथन है—

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता।

भारत की नारी प्राचीन काल में पुरुषों के समान ही स्वतंत्र थी। मध्यकाल में देश की स्थितियाँ बदलीं। आक्रमणकारियों के भय के कारण उसे घर की
चारदीवारी में सीमित रहना पड़ा। सैकड़ों वर्षों तक घर-गृहस्थी रचाते-रचाते उसे अनुभव होने लगा कि उसका काम बर्तन-चौके तक ही है। परंतु वर्तमान युग में यह धारणा बदली। बदलते वातावरण में भारतीय नारी को समाज में खुलने का अवसर मिला। स्वतंत्रता-आंदोलन में सरोजिनी नायडू, कमला नेहरू, सत्यवती जैसी महिलाओं ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई । परिणामस्वरूप स्त्रियों में पढ़ने-लिखने और कुछ कर गुजरने की आकांक्षा जाग्रत हुई। भारत की वर्तमान नारी विकास के ऊँचे शिखर छू चुकी है । उसने शिक्षा के क्षेत्र में पुरुषों से बाजी मार ली है। कंप्यूटर के क्षेत्र में उसकी भूमिका महत्त्वपूर्ण है ।

                                         नारी-सुलभ क्षेत्रों में उसका कोई मुकाबला नहीं है । चिकित्सा- शिक्षा और सेवा के क्षेत्र में उसका योगदान अभूतपूर्व है । आज अनेक नारियाँ इंजीनियरिंग, वाणिज्य और तकनीकी जैसे क्षेत्रों में भी सफलता प्राप्त कर रही हैं। पुलिस, विमान-चालन जैसे पुरुषोचित क्षेत्र भी अब उससे अछूते नहीं रहे हैं। वास्तव में आज नारी की भूमिका दोहरी हो गई है। उसे घर और बाहर दो-दो मोर्चों पर काम सँभालना पड़ रहा है। घर की सारी जिम्मेदारियाँ और ऑफिस का कार्य-इन दोनों में वह जबरदस्त संतुलन बनाए हुए है। उसे पग-पग पर पुरुष-समाज की ईर्ष्या, घृणा, हिंसा और वासना से भी लड़ना  पड़ता है। सचमुच उसकी अदम्य शक्ति ने उसे इतना महान् बना दिया है।

(ख) वर्षा-ऋतु

भारतवर्ष के अन्दर छह ऋतुएँ होती है-1.वसन्त, 2. ग्रीष्म (गर्मी), 3. वर्षा, 4. शरद् (जाड़ा), 5. हेमन्त और 6. शिशिर । हम इन छहों ऋतुओं को
तीन भागों में बाँट सकते हैं-गर्मी, वर्षा और जाड़ा । वर्षा-ऋतु मुख्यतः आषाढ़ और सावन में आती है, लेकिन इसका प्रभाव आश्विन तक बना रहता है । वर्षा-ऋतु का आगमन ग्रीष्म (गर्मी) के बाद होता है ।
                         वर्षा-ऋतु के आते ही आकाश में काले-काले बादल छा जाते हैं । बादल गरजने लगते हैं। भारी वर्षा प्रारम्भ हो जाती हैं । वर्षा के जल से धरती की जलती हुई छाती शीतल हो उठती है। जीव-जन्तुओं में खुशियाली छा जाती है । ग्रीष्म-ताप से झुलसे हुए पेड़-पौधे फिर से नये पत्तों से लदने लगते हैं। धीरे-धीरे धरती पर हरियाली छाने लगती है । वर्षा-ऋतु में दिन-रात वर्षा होती रहती है । बादलों की गरज और बिजली की कड़क बड़ी भयावह होती है। है
         जल ही जीवन है । अत: वर्षा-ऋतु में धरती को नया जीवन मिलता है। चारों ओर हरियाली छा जाने से पृथ्वी का दृश्य देखने योग्य हो जाता है । नदी और ताल-तलैया जल से लबालब भर जाते हैं । किसानों के लिए यह बहुत खुशी का समय होता है । इसी समय धान और मकई की मुख्य फसलें बोई जाती हैं । रबी की फसल के लिए जमीन में तरी आती है। भारत की खेती वर्षा-ऋतु पर निर्भर है।
              इस ऋतु से कुछ हानियाँ भी होती हैं। अधिक वर्षा के कारण नदियों में बाढ़ आ जाती है, जिससे गाँव बह जाते हैं । लगी हुई फसलें नष्ट हो जाती हैं । यातायात ठप हो जाता है । पशु-पक्षी अधिक वर्षा के कारण भींग-भींग कर मर जाते हैं । गड्ढे में पानी जम जाता है, जिससे बीमारियाँ पैदा होती हैं। इतना होने पर भी वर्षा-ऋतु से लाभ ही अधिक है । खेती के लिए यह आवश्यक ऋतु है। वर्षा नहीं हो तो धरती वीरान और रेगिस्तान बन जाएगी।

(ग) जंगल

किसी भी देश के आर्थिक विकास एवं उसकी समृद्धि के लिए वनों का महत्त्वपूर्ण स्थान है । आर्थिक विकास के लिए वन केवल कच्चे माल की पूर्ति
ही नहीं करते वरन् बाढ़ पर नियंत्रण करके भूमि के कटाव को भी रोकते हैं । भारत एक विशाल देश है, किन्तु अन्य देशों की अपेक्षा भारत में वन-क्षेत्र बहुत कम है । वन प्राकृतिक ऊर्जा के मुख्य स्रोत हैं। वनों में उगने वाले वृक्ष हमारे जीवन के मुख्य अंग हैं, क्योंकि ये कार्बन-डाइऑक्साइड का सेवन करके हमें प्राणवायु देते हैं, अन्यथा हमारा जीवन दूभर हो जाए । वन हमारी भूमि को ढकते हैं और उसके पोषक तत्त्वों की रक्षा करते हैं ।                                                                              भारतीय अर्थव्यवस्था में वनों का अत्यन्त महत्त्व है । इनसे न केवल जलाने के लिए लकड़ी मिलती है बल्कि उद्योगों के लिए बहुत कच्चे पदार्थ भी मिलते हैं। रोगों के उपचार के लिए औषधियाँ मिलती हैं, पशुओं के लिए चारा एवं सरकार के लिए राजस्व मिलता है । वन देश की जलवायु को उचित बनाए रखते हैं, वर्षा को निर्यात्रत करते हैं, भूमि-कटाव को कम करते हैं, रेगिस्तान को बढ़ने से रोकते हैं तथा देश के प्राकृतिक सौन्दर्य में वृद्धि करते
हैं । हमारे देश में वनों के क्षेत्र हर प्रदेश में असमान है । असम एवं मध्य प्रदेश में वन अधिक हैं तथा अन्य राज्यों में कम । देश में वन क्षेत्रों तक पहुँचने के लिए सड़कों की उचित व्यवस्था नहीं है । इस समस्या के कारण वनों का उचित दोहन नहीं हो पा रहा है । इसके लिए आवश्यक है कि भारत सरकार इन वन-क्षेत्रों में आवश्यक सड़कों का निर्माण करे ।
                        शहरों के निर्माण तथा नये शहरों के विकास के कारण जंगलों को काटकर साफ कर दिया जाता है, जिससे देश के वन-क्षेत्र में निरन्तर कमी होती जा रही है । इसके लिए सरकार को चाहिए कि शहरों का सन्तुलित ढंग से विकास करे तथा क्षतिपूर्ति के लिए सड़कों के दोनों ओर वृक्ष लगवाने की व्यवस्था करे तथा स्थान-स्थान पर पार्क बनवाए ।
          वनों से लकड़ी प्राप्त करने के लिए देश में इनको निरन्तर काटा जा रहा है, जिससे वन-क्षेत्र में कमी होती जा रही है । इस समस्या को हल करने के लिए ईंधन के लिए खनन-कोयले का उत्पादन बढ़ाया जाना चाहिए तथा नये-नये क्षेत्रों में वन लगाने की व्यवस्था करनी चाहिए ।
                                    वनों से हमें लकड़ी के साथ-साथ अनेक महत्त्वपूर्ण सहायक उपजों की प्राप्ति होती है, जिनका उपयोग देश के अनेक उद्योगों में कच्चे माल के रूप में किया जाता है । इन सहायक उपजों में लाख, चमड़ा, गोंद, शहद, कत्था, छालें, बाँस एवं बेंत, जड़ी-बूटियाँ, जानवरों के सींग इत्यादि मुख्य है; जिनका उपयोग भारत के विभिन्न उद्योगों में कच्चे माल के रूप में किया जाता है। इनमें कागज उद्योग, दियासलाई उद्योग, चमड़ा उद्योग, फर्नीचर उद्योग, तेल उद्योग (चन्दन, तारपीन एवं केवड़ा आदि) तथा औषधि उद्योग मुख्य हैं । भारतीय वनों से लगभग 550 प्रकार की ऐसी लकड़ियाँ प्राप्त होती हैं जो व्यापारिक दृष्टि से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं । इनमें से साल, सागौन, चीड़, देवदार,
शीशम आबनूस तथा चन्दन आदि की लकड़ियाँ मुख्य हैं, जिनका उपयोग फर्नीचर, रंग के डिब्बे, स्लीपर जहाज आदि बनाने, माचिस बनाने तथा इमारती लकड़ी के रूप में किया जाता है ।
                   वनों से प्राप्त वस्तुओं का उपयोग करके भारत में अनेक लघु तथा कुटीर उद्योगों की स्थापना हुई है । इनमें से टोकरियाँ एवं बेंत बनाना, रस्सी बाँटना, बीड़ी बाँधना, गोंद एवं शहद एकत्र करना इत्यादि मुख्य हैं । भारतीय वनों में कुछ ऐसी वनस्पतियाँ तथा जड़ी-बूटियाँ पायी जाती है, जिनसे अनेक प्रकार की औषधियाँ तैयार की जाती हैं। औषधियों के द्वारा अनेक रोगों का उपचार किया जाता है। वन सरकार को बहुमूल्य विदेशी मुद्रा को अर्जित करने में बहुत सहायता प्रदान करते हैं । विभिन्न वन पदार्थों, जैसे-लाख, तारपीन का तेल, चन्दन का तेल एवं उससे बनी कलात्मक वस्तुओं आदि के निर्यात द्वारा सरकार को प्रति वर्ष अनुमानतः लगभग 50 करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा प्राप्त होती है ।
                                    वन वातावरण के तापक्रम, नमी तथा वायु-प्रवाह को नियंत्रित करके
जलवायु में समानता बनाये रखते हैं । वन आँधी-तूफानों से हमारी रक्षा करते हैं, गर्म एवं तेज हवाओं को रोककर देश की जलवायु को सम-शीतोष्ण बनाये रखते हैं। वन-वृक्ष वातावरण के दूषित वायु (कार्बन-डाइ-ऑक्साइड) ग्रहण करके भोजन बनाते हैं, जबकि अन्य जीव-जन्तु ऑक्सीजन ग्रहण करके दूषित वायु निकालते हैं । इस प्रकार पेड़-पौधे वायु-प्रदूषण को दूर करके पर्यावरण
में संतुलन बनाये रखते हैं, वन रेगिस्तान के प्रसार को रोकते हैं वे तेज आँधियों को रोककर, वर्षा को आकर्षित करके तथा मिट्री के कणों को अपनी जड़ों से बाँधकर रेगिस्तानों के प्रसार पर नियंत्रण लगाते हैं । वनों से बाढ़ नियंत्रण में सहायता मिलती है। भूमि का कटाव कम होने से नदियों-तालाबों में मिट्टी का भराव नहीं होता और बाढ़ की सम्भावना कम हो जाती है । इसके अतिरिक्त वन वर्षा-जल को स्पंज की तरह सोख लेते हैं, जिससे बाढ़ का भय कम रहता है । वनों के कारण वर्षा मन्द गति से होती है; अतः भूमि कटाव कम होता है। वन-वृक्ष वर्षा के अतिरिक्त जल को सोखकर, नदियों के प्रवाह को नियंत्रण करके बाढ़ के प्रकोप को कम करते हैं तथा भूमि के कटाव को रोकते हैं । इस प्रकार वन भूमि को ऊबड़-खाबड़ होने से रोकते हैं और मिट्टी की उर्वरा शक्ति में कमी नहीं होने देते । वन वर्षा-जल को सोखकर अपनी जड़ों के द्वारा भूमि के नीचे पानी के स्तर को बढ़ाते रहते हैं; अतः कुओं आदि में पानी का स्तर घटने नहीं पाता ।
                             वन वर्षा में मदद करते हैं, अतः वनों को वर्षा का संचालक कहा जाता है । वनों से वर्षा होती है और वर्षा से वन बढ़ते हैं । इस प्रकार मानसून पर भारतीय कृषि की निर्भरता की दृष्टि से वन अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं । इसी कारण वनों को ‘हरा सोना’ तथा देश की राष्ट्रीय निधि माना जाता है। हमें चाहिए कि हम इस सोने को बरबाद न करें । देश के आर्थिक विकास  में वनों के भारी महत्त्व को समझते हुए भारत सरकार ने इनके विकास के लिए कई महत्त्वपूर्ण कदम उठाए हैं । पं. जवाहरलाल नेहरू ने भी वन की महत्ता के संबंध में कहा है-“एक उगता हुआ वृक्ष राष्ट्र की प्रगति का जीवित प्रतीक है।”

(घ) हमारे पड़ोसी

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है । वह अकेला जीवन नहीं बिता सकता। सामाजिक जीवन में सबसे पहले अच्छे पड़ोसी की जरूरत होती है । दिन हो
या रात, मुसीबत आने पर मदद माँगने के लिए सबसे पहले हम पड़ोसी के पास ही पहुँचते हैं, क्योंकि वही हमारे समीप होता है । इसलिए हम कह सकते हैं कि सच्चा स्वजन तो पड़ोसी ही होता है । वही हमें सुख-दु:ख में मदद करता है । एक अच्छा पड़ोसी सौभाग्य से प्राप्त होता है, अगर बुरा पड़ोसी मिल जाए तो जीना दूभर हो जाता है । हर वक्त जान मुसीबत में पड़ी रहती है । हमारे तीन पड़ोसी हैं । एक हैं श्रीमान् लालबिहारी जी । वे बड़े घमण्डी किस्म के हैं इसलिए किसी से बात करना वे अपने शान के खिलाफ समझते हैं । न जाने वे अपने आप को क्या समझते हैं ? उनके तीन बच्चे हैं-एक लड़का और दो लड़कियाँ, पर मजाल है वे बाहर आकर किसी से बात कर जाएँ । बच्चों के साथ खेलना तक उनके लिए वर्जित है, परन्तु उनकी पत्नी कभी-कभी मिलने पर मुस्कुरा देती है पर बोलती कुछ नहीं । ऐसे पड़ोसी तो हुए या न हुए, बराबर है ।
                हमारे दूसरे पड़ोसी हैं चमनलाल सेठ, वे बड़ी ही सीधे-साधे और मिलनसार आदमी हैं । उनकी पत्नी भी बड़ी सुशील महिला हैं । उनके दो बच्चे हैं-एक लड़का और एक लड़की । वे दोनों भी माता पिता की तरह हम से भाई-बहन की तरह मिल-जुलकर रहते हैं । उनसे हमारा कुछ भी काम पड़े तो ‘ना’ नहीं कहते । उनके दवाइयों की अपनी दुकान है । हम उन्हीं के यहाँ से दवाइयाँ खरीदते हैं, क्योंकि ईमानदार होने के कारण कभी नकली दवाइयाँ नहीं बेचते । वे सभी से स्नेहपूर्ण व्यवहार करते हैं । इन सभी गुणों के कारण हम उनका आदर करते हैं हमारे तीसरे पड़ोसी हैं श्रीमान श्रीकान्त राव जी । वे बड़े अजीब आदमी हैं । आजकल के जमाने में भी उन्होंने भारत की जनसंख्या बढ़ाने में काफी योग दिया है । उनके पाँच लड़के और तीन लड़कियाँ हैं । उनका घर हमेशा कुरुक्षेत्र बना रहता है । उनके बच्चे भी बड़े शरारती और असभ्य हैं । उन्हें किसी बात का ख्याल नहीं है । वे बड़े-छोटे को बिना देखे हर एक को मुँहतोड़ जवाब देते हैं । उनके यहाँ रेडियो या टीवी इतनी जोर से बजाया जाता है कि पड़ोसियों के नाक में दम आ जाता है। अगर कोई कुछ कहे तो उनकी पत्नी गालियाँ देने लगती हैं । भगवान् सभी को ऐसे पड़ोसियों से बचाए । इस प्रकार हमारे पड़ोसी रंग-बिरंगे हैं । सबका अपना-अपना राग है । इस पर भी सभी के बीच स्नेह का बंधन है । सभी त्योहारों में हम एक-दूसरे से प्रेमपूर्वक मिलते हैं, जैसे हम सभी एक ही परिवार के सदस्य हों। हम लोगों पर ऊँच-नीच तथा प्रांतीयता का विष नहीं चढ़ता ।

(ङ) वसंत ऋतु

भारत में सभी ऋतुओं का दर्शन और अनुभव होता है । ऋतुराज वसन्त की बात ही अलग है । वसन्त ऋतु के विषय में विद्वानों का कहना है कि
“वसन्त आता नहीं लाया जाता है” । यहाँ वसन्त से तात्पर्य मुस्कुराहट, यौवन, मस्ती आदि से है । कहने का तात्पर्य यह है कि इस ऋतु में मानव, पशु-पक्षी, वनस्पति सभी प्रफुल्ल रहते हैं । यह ऋतु अपनी विशेषताओं के कारण सभी का प्यारा है । फाल्गुन से वैशाख तक यह ऋतु अपने स्वाभाविक गुणों से सभी को आनन्दित करती है । यह ऋतु अंग्रेजी महीनों के मार्च एवं अप्रैल में होती है । वसन्त पंचमी का त्यौहार तो इसी के नाम पर है लेकिन यह पहले ही सम्पन्न हो जाता है । होली का त्योहार इसी में आता है । वसन्त ऋतु में न अधिक ठंड होती है और न अधिक गर्मी । इस ऋतु में प्रायः आकाश साफ रहता है । इसमें दिन बड़ा होता है और रात छोटी । वन-उपवन में चारों ओर नई-नई कोपलें ही दिखाई पड़ती हैं । वृक्ष, पौधे आदि सभी एक-दूसरे को  प्रफुल्लित करते रहते हैं नए-नए फूल चारों ओर दिखाई पड़ते हैं । उनके मधुर रस का पान करके भौरे, तितलियाँ आदि सभी मतवाले होकर इधर-उधर घूमते रहते हैं । आम्रमंजरियाँ भी अपनी गंध से सभी को मादक बना देती हैं। इस ऋतु में ही कोयल की आवाज इधर-उधर गूंजती रहती है । इस ऋतु में मानव के साथ-साथ वनस्पतियाँ भी प्रसन्न हो जाती हैं ।
             उन पर नए फूल और फल वातावरण को और भी सुन्दर बना देते हैं । नाना प्रकार के फल मिलते हैं जिसको खाकर मनुष्य नई चेतना को प्राप्त करते हैं । उनका शरीर भी खिल उठता है। सभी प्राणी और वनस्पतियाँ आनन्द के सागर में हिलोरें लेने लगते हैं । ठंड से राहत मिलते ही सभी जल और जलाशय का आनन्द लेने के लिए मचल उठते हैं । होली का त्योहार भी यह प्रदर्शित करता है कि ठंडक चली गयी है और स्नान से घबराना नहीं है । इस ऋतु में ही रबी फसल कटती है जो मानव जीवन का आधार है । वसन्त ऋतु में प्रायः भ्रमण का अलग महत्त्व हैं । वसन्त ऋतु में चारों
ओर मनमोहक वातावरण में सैर करने से शरीर के साथ-साथ मन भी प्रसन्न होता है। इसे ऋतु को स्वास्थ्यवर्धक ऋतु मानी गई है । कहा गया है कि इस ऋतु में नियमपूर्वक रहने से रोग इत्यादि दूर रहते हैं । यह ऋतु छात्रों के लिए भी उपयोगी है, क्योंकि वातावरण स्वच्छ रहने से भरपूर पढ़ाई होती है।
        अन्त में, यह कह सकते हैं कि विद्वानों का यह कथन कि वसन्त आता नहीं लाया जाता है, सही होते हुए भी वसन्त ऋतु एक अलग रूप प्रस्तुत करता है अर्थात्, इस ऋतु की इतनी विशेषताएँ है कि आनन्द, मस्ती, प्रफुल्लित मन, सुन्दर और स्वच्छ वातावरण ही वसन्त का पर्याय हो गया है।

 

4. विद्यालय में पेयजल की समुचित व्यवस्था करने का अनुरोध करते हुए प्रधानाचार्य को पत्र लिखें।
अथवा
दिवाली के पटाखों से ध्वनि एवं वायु प्रदूषण को केन्द्र में रखकर दो छात्रों के बीच संवाद लिखें ।
उत्तर-

प्रधानाचार्य,
                  बाल विद्या पब्लिक स्कूल
                  पटना ।
                   विषय : विद्यालय में पेयजल की समुचित व्यवस्था हेतु आवेदन ।
महोदय,
सविनय निवेदन है कि मैं आपके विद्यालय का कक्षा दशम का एक छात्र हूँ । मैं आपका ध्यान विद्यालय के अशुद्ध पेयजल की ओर आकृष्ट कराना चाहता हूँ । इस अशुद्ध पानी के सेवन से अनेक छात्र अस्वस्थ होकर अस्पताल में भर्ती हैं । पिछले कुछ दिनों से पानी का स्वाद और रंग बदला-सा था, जिसकी जानकारी हमने अपनी कक्षाध्यापिका को भी दी थी।
         इसके अतिरिक्त विद्यालय में पीने के पानी की भारी कमी है। विद्यालय में केवल तीन कूलर हैं, जिन पर सदा छात्रों की भीड़ लगती रहती है, अतः गर्मी के दिनों में सभी की प्यास नहीं बुझ पाती है और इन कूलरों की ठीक से सफाई भी नहीं होती है, जिसका परिणाम छात्रों को भुगतना पड़ता है ।
        अतः आपसे विनम्र निवेदन है कि विद्यालय में शुद्ध पेयजल की समुचित व्यवस्था करवाने का कष्ट करें, साथ ही संबंधित कर्मचारियों को समय-समय पर कूलरों की सफाई का भी निर्देश दें। दि० 14-03-2022

आपका आज्ञाकारी शिष्य
सुरेश (कक्षा-10)

अथवा

जय : कहो देवेश, कैसे हो ?
देवेश : ठीक हूँ यार । बस, परीक्षा की तिथि सिर पर है । बहुत बेचैनी है।
जय: चिन्ता करने से कुछ नहीं होगा । परीक्षा तो निश्चित तिथि पर होगी ही । तुम्हें समय सीमा के अन्दर पाठ की पुनरावृत्ति करनी होग
देवेश : लेकिन क्या करूँ । बहुत बेचैनी है । कभी सर्दी-जुकाम तो कभी पेट की बीमारी । स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता ।
जय: क्यों, क्या बात है?
देवेश : अभी विवाह का मौसम है । दिन-रात लाउडस्पीकर बजता रहता है । गाड़ी की ची-पों होती रहती है । रात-दिन कभी भी ठीक से
सो नहीं पाता हूँ।
जय : हाँ, बात तो सही है । पूरा वातावरण ही प्रदूषित हो गया है । ऑक्सीजन की कमी हो गई है और कार्बन मोनोक्साइड की मात्रा
में वृद्धि होती जा रही है।
देवेश : ऐसी स्थिति में लोगों को जीना दूभर हो जाएगा । इसके लिए सामाजिक स्तर पर कुछ न कुछ करना चाहिए । सरकार को चाहिए
कि ध्वनि प्रदूषण और वायु प्रदूषण फैलाने वाले उपकरणों को प्रतिबंधित करे ।
जय: हाँ यही एक उपाय है।
देवेश : चलता हूँ दोस्त । ढेर सारी शुभकामनाएँ ।
जय : राम ! राम ! धन्यवाद ।

 

5. निम्नलिखित प्रश्नों में से किन्हीं पाँच प्रश्नों के उत्तर प्रत्येक लगभग 20-30 शब्दों में दें:

(क)आविन्यों के प्रति लेखक कैसे अपना सम्मान प्रदर्शित करते हैं ?
उत्तर-आविन्यों में 19 दिन रहकर लेखक ने पवित्रता, शांति और प्रेम का अनुभव किया है। यहाँ उसने बहुत कुछ पाया है, इसलिए वह आविन्यों के सम्मान में उसकी प्राचीनता, ऐतिहासिकता तथा संवेदनशीलता को आधार बनाकर कविता रचता है, गद्य लिखता है और अपनी कृति में उसे अमर रखना चाहता है।

(ख) बढ़ते नाखूनों द्वारा प्रकृति मनुष्य को क्या याद दिलाती है ?
उत्तर-बढ़ते नाखूनों द्वारा प्रकृति मनुष्य को उसके आदिम पाश्विक वृत्ति और संघर्ष को याद दिलाती है। प्रकृति मनुष्य को उसके भीतर वाले अस्त्र से वंचित नहीं कर रही है, अब भी वह याद दिला देती है कि तुम्हारे नाखून को भुलाया नहीं जा सकता।

(ग) गुर्जर प्रतिहार कौन थे?
उत्तर-गुर्जर-प्रतिहार बाहर से भारत आए थे। ईसा की आठवीं सदी के पूर्वार्द्ध में अति प्रदेश में उन्होंने अपना शासन खड़ा किया और बाद में कन्नौज पर अधिकार कर लिया था। मिहिरभोज, महेंद्रपाल आदि प्रख्यात प्रतिहार शासक हुए।

(घ) कलकत्ते के दर्शकों की प्रशंसा का बिरजू महाराज के नर्तक जीवन पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर-कलकत्ते में बिरजू जी ने अपने चाचा शम्भू महाराज और पिताजी के साथ नृत्य किये थे। उनमें बिरजू जी को सर्वोत्तम पुरस्कार मिला । अखबारों में वे छा गये । उनके नर्तक जीवन की एकाएक पहचान बन गई। उसके बाद वे मुम्बई गये।

(ङ) गुरु की कृपा से किस युक्ति की पहचान हो पाती है?
उत्तर-गुरु की कृपा से ईश्वर से एकाकार होने की युक्ति मिलती है। जिस तरह पानी-पानी के साथ मिलकर अपने अस्तित्व को अर्पण कर देता है।
उसी प्रकार मानव भी ईश्वर के परमपद को प्राप्त कर अपने जीवन को उसी में समर्पित कर देता है।

(च) कवि की दृष्टि में आज भारतमाता का तप-संयम क्यों सफल है ?
उत्तर-विदेशियों द्वारा बार-बार पद-दलित करने के उपरान्त भी भारतमाता की सहृदयता के भाव को नहीं रौंदा गया है। इसकी सहनशीलता आज भी बरकरार है। आज भी यह अहिंसा का पाठ पढ़ाती है। लोगों के भय को दूर करती है। सब कुछ खो देने के बाद भी यह अपनी संतान को ‘वसुधैव
कुटुम्बकम्’ की ही शिक्षा देती है। यह भारतमाता के तप का ही परिणाम है कि उसकी संतान आज भी सहिष्णु बने हुए हैं।

(छ) वृक्ष और कवि में क्या संवाद होता था?
उत्तर-वस्तुतः यहाँ कवि संवाद को कल्पनात्मक रूप देकर यथार्थ को प्रकट करना चाहता है। वृक्ष हमारे मित्र हैं। घर के सामने खड़ा बूढ़ा वृक्ष
कवि से पहले परिचय पूछता था। कवि अपने-आपको दोस्त कहकर उसके मन की व्यथा को कम कर देता था। वृक्ष भी उसे दोस्त समझकर उसको अपनी छाया देकर थकान दूर कर देता था।

(ज) कवि अगले जीवन में क्या-क्या बनने की संभावना व्यक्त करता है और क्यों?
उत्तर-कवि अगले जीवन में अबाबील, कौवा, हंस, उल्लू, सारस आदि बनने की संभावना व्यक्त करता है। उसे आशा है कि मनुष्य में जन्म नहीं होने पर संभवतः पक्षियों में इन्हीं रूपों में अवतरित होऊँगा। कवि स्वच्छंद जीवन जीना चाहता है। अतः पक्षी जीवन को श्रेष्ठ मानता है

(झ) माँ मंगु को अस्पताल में क्यों नहीं भर्ती कराना चाहती है ? विचार करें।
उत्तर-माँ अस्पताल की व्यवस्था से मन-ही-मन काँप जाती थी । वह अस्पताल को अपंग जानवरों की गोशाला के रूप में समझती थी । मंगु बिस्तर पर पैखाना, पेशाब कर देती थी । माँजी को आत्मविश्वास था कि अस्पताल में डॉक्टर, नर्स आदि सभी अपना कोरम पूरा करेंगे । बिस्तर भींगने पर कौन उसके कपड़े और बिस्तर बदलेगा । माँजी के मन में इसी तरह के विविध प्रश्न उठा करते थे । इन्हीं कारणों से वह मंगु को अस्पताल में भर्ती नहीं कराना चाहती थी ।

(ञ) दलेई बाँध की सुरक्षा के लिए कौन-कौन से उपाय किए जा रहे हैं ?
उत्तर-दलेई बाँध की सुरक्षा के लिए स्वयंसेवक दल का गठन किया गया है । गाँव के लड़के बारी-बारी से दलेइ बाँध की निगरानी कर रहे हैं। बाँध
के कमजोर स्थानों पर मिट्टी डाली जा रही है । बाँध को और मजबूत करने के लिए पत्थर ढोये जा रहे हैं । रेत की बोरियाँ इकट्ठी की जा रही हैं । कहीं बाढ़ का पानी बाँध न तोड़ दे, इसलिए रतजगा हो रहा है

 

6. निम्नलिखित प्रश्नों में से किसी एक प्रश्न का उत्तर लिखिए (शब्द सीमा लगभग 100) :

(क) मनुष्य जीवन से पत्थर की क्या समानता और विषमता है ?
उत्तर-पत्थर का निर्माण प्राकृतिक कारणों से हुआ है। पत्थर में संवेदना या चेतना का अभाव है। मनुष्य चेतन और संवेदनशील है। मनुष्य में सजीवता, चिंतन शक्ति और अनुभव करने की क्षमता है। पत्थर निर्जीव, असंवेदनशील, जड़ पदार्थ है। लेकिन जब कवि उसका मानवीकरण करता है तब वह सजीव हो उठता है। निर्माण एवं अर्थ की दृष्टि से दोनों में विषमता है। काव्यभाषा में वह नर रूप में चित्रित होता है तब मानव और उसमें समानता आ सकती है। कवि की कल्पना मूलक दृष्टि समानता और विषमता दोनों रूपों में दृष्टिगत होती है।

ख) निम्न पंक्तियों का अर्थ लिखें
“खेत है जहाँ धान के, बहती नदी
के किनारे फिर आऊँगा लौटकर
एक दिन बंगाल में।”
उत्तर-प्रस्तुत पंक्ति में कवि ने बंगाल के प्रति अपने समर्पण को अभिव्यक्त किया है। स्वच्छंदता को आधार बनाकर जीवन जीने की उत्कृष्ट
अभिलाषा रखनेवाला कवि बंगाल को ही चयन करता है। जन्मभूमि होने के साथ-साथ उसे वहाँ महापुरुषों की जीवनगाथा झलकती है। वह धान के खेतों, बहती हुई नदियों के किनारे विचरण करना चाहता है । बंगाल के धानी रंग कवि\ को अनायास आकर्षित कर लेते हैं।

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