Hindi Subjective Model Paper 2022 Bihar Board

Matric Subjective Hindi Model Paper Download 2022 | Class 10th Hindi Official Model Paper 2022 PDF

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Matric Subjective Hindi Model Paper Hindi Subject Model Paper Question 2022

खण्ड-ब/SECTION-B
गैर-वस्तुनिष्ठ प्रश्न/Non-Objective Type Questions

1. निम्नलिखित गद्यांशों में से किसी एक गद्यांश को पढ़कर नीचे दिए  गए प्रश्नों के उत्तर दें । प्रत्येक प्रश्न दो अंकों का होगा।

(क) सोना की आज अचानक स्मृति हो आने का कारण है। मेरे परिचित स्वर्गीय डॉ० धीरेन्द्रनाथ वसु की पौत्री सुस्मिता ने लिखा है, “गत वर्ष अपने पड़ोसी से मुझे एक हिरण मिला था। बीते कुछ महीनों में हम उससे बहुत स्नेह करने लगे हैं, परन्तु अब मैं अनुभव करती हूँ कि सघन जंगल से संबद्ध रहने के कारण तथा अब बड़े हो जाने के कारण उसे घूमने के लिए अधिक विस्तृत स्थान चाहिए। कृपा करके आप उसे स्वीकार करेंगी ? सचमुच मैं आपकी बहुत आभारी रहँगी क्योंकि आप जानती हैं, मैं उसे ऐसे व्यक्ति को नहीं देना चाहती जो उससे बुरा व्यवहार करे, मेरा विश्वास है, आपके यहाँ उसकी भली भाँति देखभाल हो सकेगी।”

प्रश्न (i) सुस्मिता किनकी पौत्री थी ?
(ii) सुस्मिता को किससे हिरण मिला ?
(iii) बीते कुछ महीनों में सुस्मिता क्या करने लगी थी ?
(iv) विस्तृत स्थान किसके लिए चाहिए था ?
(v) कृपा करके आप स्वीकार करेंगी ?” किसने किससे कहा ?

उत्तर-(i) सुस्मिता स्व० डॉ० धीरेन्द्रनाथ वसु की पौत्री थी ।
(ii) सुस्मिता को पड़ोसी से हिरण मिला ।
(iii) बीते कुछ महीनों में सुस्मिता हिरण से बहुत स्नेह करने लगी थी।
(iv) हिरण के लिए विस्तृत स्थान चाहिए था ।
(v) कृपा करके आप स्वीकार करेंगी ?” सुस्मिता ने लेखिका से कहा ।

 

(ख) अपने जीवन के अंतिम वर्षों में डॉ० सच्चिदानन्द सिन्हा की उत्कट अभिलाषा थी कि सिन्हा लाइब्रेरी के प्रबन्ध की उपयुक्त व्यवस्था हो जाए । ट्रस्ट पहले से मौजूद था लेकिन आवश्यकता यह थी कि सरकारी उत्तरदायित्व भी स्थिर हो जाए । ऐसा मसविदा तैयार करना कि जिसमें ट्रस्ट का अस्तित्व भी न टूटे और सरकार द्वारा संस्था की देखभाल और पोषण की भी गारंटी मिल जाए, जरा टेढ़ी खीर थी। एक दिन एक चाय-पार्टी के दौरान सिन्हा साहब मेरे (जगदीश चन्द्र माथुर) पास चुपके से आकर बैठ गये । सन् 1949 की बात है । मैं नया-नया शिक्षा सचिव हुआ था, लेकिन सिन्हा साहब की मौजूदगी में मेरी क्या हस्ती ? इसलिए जब मेरे पास बैठे और जरा विनीत स्वर में उन्होंने सिन्हा लाइब्रेरी की दास्तान कहनी शुरू की तो मैं सकपका गया । मन में सोचने लगा कि जो सिन्हा साहब मुख्यमंत्री, शिक्षामंत्री और गवर्नर तक से आदेश के स्वर में सिन्हा लाइब्रेरी जैसे उपयोगी संस्था के बारे में बातचीत कर सकते हैं, वह मुझ जैसे कल के छोकरे को क्यों सर चढ़ा रहे हैं । उस  वक्त तो नहीं, किन्तु बाद में गौर करने पर दो बातें स्पष्ट हुई । एक तो य कि मैं भले ही समझता रहा हूँ कि मेरी लल्लो-चप्पो हो रही है, किन्तु वस्तुतः उनका विनीत स्वर उनके व्यक्तित्व के उस साधारणतया आलक्षित और आर्द्र पहलू की आवाज थी, जो पुस्तकों तथा सिन्हा लाइब्रेरी के प्रति उनकी भावुकता के उमड़ने पर ही मुखरित होता था।

प्रश्न-(i) सिन्हा साहब लाइब्रेरी के लिए कैसा मसविदा करना चाहते थे?
(ii) माथुर साहब क्यों सकपका गये ?
(iii) सिन्हा साहब किनके साथ और किसलिए आदेशात्मक स्वर में बात कर सकते थे ?
(iv) माथुर साहब जिसे लल्लो-चप्पो समझते थे, वह वास्तव में क्या था?
(v) कब और कौन नये-नये शिक्षा सचिव हुए थे?

उत्तर-(i) सिन्हा साहब लाइब्रेरी के लिए ऐसा मसविदा करना चाहते थे जिसमें ट्रस्ट का अस्तित्व भी न टूटे और सरकार द्वारा संस्था की देखभाल और पोषण की भी गारंटी मिल जाए
(ii) सिन्हा साहब ने जब विनीत स्वर में सिन्हा लाइब्रेरी की दास्तान कहनी शुरू की तो माथुर साहब सकपका गए ।
(iii) सिन्हा साहब मुख्यमंत्री, शिक्षामंत्री और गवर्नर तक से सिन्हा लाइब्रेरी जैसी उपयोगी संस्था के बारे में आदेशात्मक स्वर में बात कर सकते थे ।
(iv) माथुर साहब जिसे लल्लो-चप्पो समझते थे, वस्तुतः वह उनकीसिन्हा लाइब्रेरी के प्रति भावुकता थी।
(v) सन् 1949 में माथुर साहब (जगदीश चन्द्र माथुर) नये-नये शिक्षा सचिव हुए थे।

 

2. निम्नलिखित गद्यांशों में से किसी एक गद्यांश को पढ़कर नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर दें । प्रत्येक प्रश्न दो अंकों का होगा। 5 

(क) वृक्ष की बाहरी छाल के नीचे वाली स्नायविक शिराओं में यंत्र लगाने पर वृक्षों के हृदय की धड़कन रिकॉर्ड की जा सकती है । मनुष्य की तरह ही वृक्षों में भी नाड़ी का स्पंदन होता है लेकिन अत्यधिक धीमी गति से । एक करोड़ गुणा बढ़ाकर ही यंत्र द्वारा उसकी गति को ग्राफ के रूप में अंकित किया जा सकता है । लगभग एक मिनट में एक बार ही वृक्ष के स्नायु धड़कन के रूप में विस्तार और संकुचन की क्रिया पूरी करते हैं । अगर वृक्ष के पानी में कपूर या कैफीन मिला दीजिए तो देखिए कि मनुष्य के हृदय पर इन पदार्थों का जैसा प्रभाव पड़ता है, वृक्ष के हृदय पर भी वे ठीक वैसा ही प्रभाव डालते हैं। उसकी गति एकाएक तेज हो जाती है और वह जोर से धड़कने लगता है और अगर कपूर और कैफीन जैसे उत्तेजक पदार्थों की जगह पानी में विष या अधिक मात्रा में क्लोरोफॉर्म मिलाकर जड़ में डाल दें तो ग्राफ की रेखाएँ एक मृत्युग्रस्त मानव की पीड़ा जैसा आभास देती हैं । वृक्ष के हृदय का स्पंदन रुक जाता है और प्लेट पर सूई ऊँची-नीची रेखाएँ अंकित करने की जगह धीरे-धीरे एक सीधी रेखा खींचने लगती है । लेकिन जब तक वृक्ष में जीवन का कुछ भी अंश शेष रहता है, यह रेखा बीच-बीच में कुछ ऊँची-नीची होती जाती है मानो जिस वृक्ष की जहर देकर हत्या की गई है वह जीवन के लिए अंतिम संघर्ष कर रहा हो और उसमें रह-रहकर बुझते जीवन की लौ चमक उठती हो । कुछ देर बाद सूई का ऊपर-नीचे उठना बंद हो जाता है और वृक्ष की सूचना देने वाली सीधी रेखा खिंच जाती है । आचार्य बसु ने अपने परीक्षणों से चर जगत् के प्राणियों से उद्भिज प्राणियों की समानता सिद्ध करके वनस्पति-विज्ञान के क्षेत्र में अनुसंधान के नए क्षितिज खोल दिए। अपने इस कार्य से वे विज्ञान के क्षेत्र में सदा अमर रहेंगे ।

प्रश्न:
(i) उपर्युक्त गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक लिखिए ।
(ii) किसने वनस्पति विज्ञान के क्षेत्र में अनुसंधान के नए क्षितिज खोल दिए ?
(iii) वृक्षों के हृदय की धड़कन किस प्रकार रिकॉर्ड की जा सकती है?
(iv) वृक्ष के पानी में कपूर या कैफीन मिला दी जाए तो क्या होगा? मृत्यु की
 (v) वृक्षों के नाड़ी का स्पंदन ग्राफ के रूप में किस प्रकार रिकॉर्ड की जा सकती है ?

उत्तर:
(i) उपर्युक्त गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक है, ‘जगदीशचंद्र बसु का वनस्पति विज्ञान के क्षेत्र में अनुसंधान’ ।
(ii) आचार्य जगदीशचन्द्र बसु ने वनस्पति विज्ञान के क्षेत्र में अनुसंधान ने के नए क्षितिज खोल दिये ।
(iii) वृक्ष की बाहरी छाल के नीचे वाली स्नायविक शिराओं में यंत्र लगाने पर वृक्षों के हृदय की धड़कन रिकॉर्ड की जा सकती है ।
(iv) यदि वृक्ष के पानी में कपूर और कैफीन मिला दी जाए तो अचानक उसकी गति तेज हो जाती है और वह जोर से धड़कने लगता है। मनुष्य के हृदय पर जैसे इन पदार्थों का प्रभाव पड़ता है, उसी तरह वृक्षों पर भी पड़ता है
(iv) वृक्ष की बाहरी छाल के नीचे वाली स्नायविक शिराओं में यंत्र लगाने पर वृक्षों के हृदय की धड़कन रिकॉर्ड की जा सकती है । क्योंकि मनुष्य की तरह ही वृक्षों में भी नाड़ी का स्पंदन होता है लेकिन अत्यधिक धीमी गति से । एक करोड़ गुणा बढ़ाकर ही यंत्र द्वारा उसकी गति को ग्राफ के रूप में अंकित किया जा सकता है

 

(ख) भोजन संबंधी भूलों में सबसे बड़ी भूल बिना भूख के खाना है। बिना भूख भोजन करना अपने शरीर के साथ अपराध करना है । प्रायः लोगों का विचार है कि अधिक खाने से शरीर हृष्ट-पुष्ट होता है और कम खाने से शरीर कमजोर हो जाता है । यह धारणा बिल्कुल गलत और स्वास्थ्य के नियमों का ज्ञान न होने की सूचक है । सभ्य समझी जाने वाली जातियों में यह प्रथा अधिक प्रचलित है । यही कारण है कि उनमें अपच का रोग बहुत अधिक होता है। मनुष्य ही एक ऐसा प्राणी है जो भूख न लगने पर भी भोजन करता है। अन्य कोई प्राणी बिना तेज भूख लगे भोजन नहीं करता । कई सहस्र व्यक्ति भोजन केवल एक बार करते हैं । इस प्रकार के व्यक्ति केवल अभ्यासवश भोजन करते हैं और वे प्रायः उसे अपना कर्तव्य समझते हैं । भोजन को कभी कर्तव्य नहीं समझना चाहिए और न ही उसका अभ्यास डालना चाहिए। भोजन जब अच्छा नहीं लगता, तब वह लाभप्रद भी नहीं होता । हम जो कुछ खाते हैं, उसी से ही हमारे शरीर का निर्माण होता है । अतएव भोजन ऐसा होना चाहिए जो संतुलित हो, ताजा हो और शीघ्र पच जाने वाला हो । ऐसे भोजन से ही हम दीर्घजीवी, स्वस्थ और नीरोग होते हैं ।

प्रश्न:
(i) गद्यांश का उचित शीर्षक दीजिए ।
(ii) भोजन कब करना चाहिए ?
(iii) कौन-से लोगों में अपच का रोग अधिक होता है ?
(iv) भोजन कब अच्छा नहीं लगता ? अच्छा न लगने पर भी भोजन करना क्यों हानिकर होता है ?
(v) हमारे शरीर का निर्माण कैसे होता है ?

उत्तर:
(i) शीर्षक-भोजन संबंधी भूल ।
(ii) भोजन तब करना चाहिए जब भूख लगी हो । बिना भूख के भोजन करना हानिकारक होता है । उससे बदहजमी और अपच का रोग होता है । यह शरीर के लिए लाभदायक नहीं है
(iii) सभ्य समझी जाने वाली जातियों में यह धारणा प्रचलित है कि अधिक खाने से शरीर हृष्ट-पुष्ट होता है । कम खाने से शरीर कमजोर हो जाता है । अतएव वे भूख न लगने पर भी भोजन करते हैं । इसलिए इन लोगों में अपच का रोग अधिक होता है।
(iv) जब भूख न लगी हो, तब भोजन अच्छा नहीं लगता । भोजन चाहे कितना भी अच्छा और बढ़िया क्यों न हो, उसका वास्तविक आनंद तभी लिया जा सकता है जब भूख लगी हो । भोजन तभी लाभदायक होता है जब वह
अच्छा लगे ।
(v) हम जो कुछ खाते हैं उसी से हमारे शरीर का निर्माण होता है

3. निम्नलिखित में से किसी एक विषय पर दिए गए संकेत-बिन्दुओं के आधार पर लगभग 250-300 शब्दों में निबंध लिखें :
(क) ग्राम जीवन
(ख) विज्ञान : वरदान और अभिशाप
(ग) आकाशवाणी
(घ) भारत में श्वेत क्रान्ति
(ङ) राष्ट्रीय एकता और अखण्डता
उत्तर-

(क) ग्राम जीवन

गाँव में रहनेवाले लोगों का जीवन बहुत ही सादा होता है । वहाँ शहरों का चाक-चिक्य, चकाचौंध, शोर आदि हलचलें नहीं दिखाई पड़तीं । वहाँ शहर की तरह भाग-दौड़ और उठापटक भी नहीं है । गाँव में शहरों की भाँति कृत्रिम जीवन बिल्कुल नहीं है । यद्यपि रेडियो, टेलिविजन, फोनोग्राफ, विडियो आदि

                                  शहरी रंगों का प्रवेश गाँव में हो रहा है, फिर भी गाँव अपने उसी पुराने परम्परागत संस्कार में जी रहा है । आज भी ग्राम जीवन प्रकृति के साथ जुड़ा हुआ है । ग्रामवासियों का रहन-सहन, खान-पान, पहनावा-ओढ़ावा, रंग-ढंग आदि सब में सरलता मौजूद है । उनकी बोली से भी सरलता की मिठास प्रकट होती है । अतिथियों का स्वागत-सत्कार करने में ग्रामीणों का मुकाबला शहरी लोग कभी नहीं कर सकते । बड़ी ही नम्रता और प्रेम के साथ गाँववाले अतिथियों का
स्वागत-सत्कार करते हैं।

           गाँव में भाईचारे की भावना और अपनापन तथा सामुदायिक भावना
वर्तमान है । लोग एक-दूसरे की दिल खोलकर सहायता करते हैं । गाँव केलोग आपस में एक परिवार की तरह रहते हैं और सबको अपने सम्बन्ध और पद के अनुरूप ही पुकारते हैं । यह अपनत्व और भाईचारा ग्राम जीवन के अलावा शहरी जीवन में संभव नहीं । गाँव के लोगों को प्रकृति का नैसर्गिक सुख प्राप्त रहता है । वे खुले वातावरण में, ताल-तलैया, नदी-पोखर और खेत-खलिहान का भरपूर आनन्द लेते हैं । शुद्ध हवा और मनोरम दृश्य प्राप्त करने का उन्हें जो सौभाग्य प्राप्त है वह शहर के कृत्रिम जीवन को नसीब कहाँ। दूर-दूर तक फैले खेतों में मखमल-सी हरियाली, नदियों में लहरों को पेंग मारती और किल्लोल करती जलधाराएँ, भाँति-भाँति के पक्षियों की चहचहाहट, बसंत में कोयल की सुमधुर बोली, रात में झाँझ ढोलक पर आल्हा और रामचरितमानस का गायन ये सारे-के-सारे साधन ग्राम जीवन को आनन्दित कर सुखमय बनाते हैं । संभवतः इन्हीं सब कारणों से राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की लेखनी से यह पंक्ति सहसा निस्सृत हुई होगी । अहा! ग्राम जीवन भी क्या है । सचमुच यहाँ थोड़े में बहुत कुछ है । सबसे बड़ी बात, ग्राम जीवन में संतोष है और सरलता तथा सौन्दर्य है।

             ग्राम जीवन एक प्रकार से आदर्श जीवन है । यद्यपि वहाँ भी छल और चपलता का प्रवेश हो रहा है तथापि आज भी ग्राम जीवन स्वस्थ एवं पवित्र है । ग्रामीणों में अपनापन की भावना मौजूद है । भोलापन उनके स्वभाव और रहन-सहन में बरकरार है । सादगी उनके जीवन के हर क्षेत्र में नजर आती है।vग्राम जीवन का एक दूसरा स्वरूप भी है, जो दयनीय और चिन्तनीय है।

               स्वतन्त्रता के पचास वर्षों के बाद भी गाँवों की जीवन जस का तस है । हमारे
देश में बहुत ही कम गाँव हैं जहाँ रंचमात्र सुधार हुए हैं । शेष गाँव आज भी पुरानी परम्परा में जीर्ण-शीर्ण अवस्था में जी रहे हैं । वही गरीबी, वही अशिक्षा, वही गाय-बैलों का संग, खेती की वही पुरानी घिसी पिटी परम्परा, वही झोपड़ियाँ, वही खपरैल मकान, वही खेन्दरा, वही चिथड़ा, कीचड़ सने, मटमैले नजर आते हैं। गलियों बरसात के दिनों में जाना दुष्कर हो जाता है, क्योंकि कीचड और गोबर से गलियाँ भरी रहती हैं । नालियों का भी वही हाल है, पानी के बहाव का कोई प्रबन्ध नहीं है ।इस प्रकार, हमारे ग्राम जीवन का एक पक्ष अत्यन्त ही दारुण है । किसान आज भी लकीर-के-फकीर बने हुए हैं । शिक्षा का नया प्रकाश और विद्युत का प्रकाश दोनों गाँवों में समुचित रूप से नहीं पहुंच पाया है । हाँ, कुछ नौजवानों में शहरीपन के आने से फुलपैण्ट-शर्ट आदि पहनने का शौक दिखाई पडा है ।

      फिर भी गाँवों का सामान्य जीवन अत्यन्त पिछडा है। गाँव के लोगों में न नयी गति आयी है, न उत्साह है, न नयी हवा आयी है, बस किसी प्रकार जी लेना-‘जाहि विधि राखे राम ताहि विधि रहिए’ । अब भी उनमें यही भावना काम कर रही है ‘कोउ नृप होहिं हमें का हानि’ । वे चुनाव को समझते हैं, चुनाव में भाग लेते हैं, परन्तु राष्ट्र को नहीं समझ पाते ।

(ख) विज्ञान : वरदान और अभिशाप

विज्ञान की विजय-पताका जल, थल और आकाश तीनों क्षेत्रों में बड़ी शान से लहरा रहा है । विज्ञान के कारण ही मानव-जीवन सुखमय बन गया है। आज हमारी दृष्टि जहाँ कहीं भी जाती है, विज्ञान अपने चमत्कारों से हमारा स्वागत करने हेतु तत्पर दृष्टिगोचर होता है ।

       विज्ञान ने हमें बहुत कुछ दिया है । इसे ‘अलाउद्दीन का चिराग’ कहा जाए, तो कोई अत्युक्ति नहीं होगी । हम रेल, मोटरकार, स्कूटर, मोटरसाइकिल, ट्राम, मेट्रो ट्रेन तथा वायुयान से लंबी दूरी बहुत कम समय में ही तय कर लेते हैं। मेट्रो ट्रेन तो विचित्र है । ऊपर धरती का कोलाहल और नीचे भागती-दौड़ती रेलगाड़ी । विज्ञान ने ध्वनि-गति से भी तेज चलनेवाले रॉकेटों का आविष्कार कर लिया है । मानव इसके सहारे (विज्ञान के सहारे) चाँद पर उतर चुका है और अब मंगल तथा शुक्र की धरती पर उतरने के प्रयास में लगा है । कुछ वर्ष पूर्व अमेरिका ने सुदूर अंतरिक्ष में रेडियो सिगनल्स भेजे हैं कि यदि मानव पृथ्वी पर भी रहते हैं तो टेलीफोन से हम संसार के किसी क्षेत्र के अपने संबंधी से बात कर सकते हैं । अब तो फोटोफोन का भी आविष्कार हो गया है-बात करते रहिए और बात करनेवाले का फोटो भी देखते रहिए । टेलीप्रिंटर से एक जगह से दूसरी जगह समाचार कुछ ही क्षणों में अपने-आप छप जाता है ।

                      बेतार का तार विज्ञान का महत्त्वपूर्ण आविष्कार है। विज्ञान-जगत् को इसके
आविष्कार के लिए जगदीशचंद्र बोस का सहयोग हमेशा याद रखना चाहिए। रेडियो, टेलीविजन, विडियो और सिनेमा ने तो संसार की पुरानी सभ्यता को एकदम बदल दिया है । कंप्यूटर के करिश्मों से तो हमारी बुद्धि चकरा जाती है । कुछ महीने पूर्व जापान ने कम्प्यूटर में ‘सेन्स’ भरने में भी सफलता प्राप्त कर ली है । ऐसे कम्प्यूटर उसने मोटरकार में लगाए हैं । चालक यदि ब्रेक नहीं लगाता है तो यह कम्प्यूटर ही खतरा देखकर ब्रेक लगा देता है । इस पर सारा संसार चकित है । जो गणित मानव नहीं बना सकता, उसे कम्प्यूटर बनाता है ।

            कम्प्यूटर अब अंधों के लिए किताब पढ़ता है, मोटरकारें चलाता है । कम्प्यूटर उपन्यास लिखता है और आपका भाग्य भी बताता है । कृषि और स्वास्थ्य के क्षेत्र में विज्ञान ने अनेक महत्त्वपूर्ण उपलब्धियाँ प्राप्त की हैं। ऑपरेशन, प्लास्टिक सर्जरी और असाध्य बीमारियों की दवा का आविष्कार कर विज्ञान ने मानवता का बहुत बड़ा उपकार किया है । दिल का ऑपरेशन कर उसमें वाल्व लगाना अब कठिन नहीं रहा । 1992 ई० के दिसम्बर में अमेरिका में एक दिन के शिशु का ऑपरेशन कर उसके हृदय का वाल्व बदला गया और वह शिशु भला-चंगा है । ‘टेस्टट्यूब बेबी’ तो विज्ञान का अपूर्व चमत्कार है । विज्ञान अब ज्योतिषी का कार्य भी करने लगा है । आँधी, तूफान, वर्षा आदि की सूचना यह पहले दे देती है, जिससे हम अपनी सुरक्षा की व्यवस्था समय रहते कर लेते हैं । ‘रोबोट’ का आविष्कार तो अभिभूत करनेवाला है । लोहे का आदमी (रोबोट) हमारी आज्ञा का अक्षरशः पालन करता है । विज्ञान के सहारे मानव ने समुद्र तल पर घर बसाया है और स्पेस’ (अंतरिक्ष) में घर बनाने की बात सोच रहा है ।

        विज्ञान ने अनेक चमत्कारपूर्ण आविष्कार किए हैं । इसकी सूची बहुत लंबी है । बिजली तो विज्ञान की सर्वोत्तम उपलब्धि है । इस पर ही विज्ञान के अनेक खेल आधृत हैं। विज्ञान हमारे लिए वरदान सिद्ध हुआ है तो अभिशाप भी । इसने विध्वंसकारी अस्त्र-शस्त्र बनाए हैं, जिनसे हरी-भरी पृथ्वी क्षणभर में झुलसकर राख हो सकती है । द्वितीय विश्वयुद्ध और इराक-कुवैत की लड़ाई में विज्ञान की विनाशलीला से हम परिचित हो चुके हैं । आज विकसित देशों के पास इतने हाइड्रोजन और परमाणु (एटम) बम हैं, जिनसे हम इस हरी-भरी पृथ्वीbजैसी हजारों पृथ्वियों क्षण भर में राख में बदल सकते हैं । आज सारी दुनिया बारूद के ढेर पर सोई है । पता नहीं, उस ढेर से कब आग लग जाए और यह चहकती दुनिया राख के ढेर में बदल जाए ।

          विज्ञान ने वायुमंडल को प्रदूषित किया है और संपूर्ण प्राणिजगत के लिए खतरा पैदा कर दिया है । वास्तव में विज्ञान इस विनाश के लिए दोषी नहीं है, दोषी हैं इसके प्रयोग करनेवाले । हम विवेकशील होंगे तो विज्ञान हमारे लिए वरदान सिद्ध होगा । हम विवेक को ताक पर रखेंगे तो विज्ञान अभिशाप बन जाएगा । विज्ञान के संबंध में ‘दिनकर’ जी की चेतावनी ध्यान में रखनी होगी सावधान मनुष्य ! यदि विज्ञान है तलवार, तो इसे दे फेंक तजकर मोह, स्मृति के पार । विज्ञान हमारे ‘श्रेय’ का साधन बन सके तो वह स्वीकार्य है, अन्यथा नहीं।

(ग) आकाशवाणी

आकाशवाणी (रेडियो) संचार का आधुनिक एवं आश्चर्यजनक उपयोगी आविष्कार है । इसने सारे संसार को एकाकार कर दिया है । इससे हम सारी दुनिया का समाचार घर बैठे सुन सकते हैं । इसके द्वारा संगीत, नाटक आदि का आनन्द लेते हैं और तरह-तरह के ज्ञान-विज्ञान की बातें सीखते हैं ।

              अपने देश में रेडियो को ‘आकाशवाणी’ के नाम से भी जाना जाता है । इस आकाशवाणी को चर्चा पौराणिक ग्रंथों में भी हुई है । रेडियो का प्रचार अब घर-घर में हो गया है । अगर हम चाहें तो घर बैठे रह सकते हैं और सारे संसार की विविध बातें घर बैठे बिस्तर पर लेटे ही लेटे सुन सकते हैं । सुबह होते ही सुनने को मिलता है-“यह आकाशवाणी पटना है,यह दिल्ली है”, यह ‘आकाशवाणी का लखनऊ केन्द्र है’, ‘अब थोड़ी देर में समाचार होंगे, पहले हिन्दी में, फिर अंग्रेजी में आदि ।’ संध्या समय बाहर टहलने जाइए तो पान वाले की दुकान में आवाज आती है, ‘अभी आपने लता मंगेशकर को सुना, अब सुनिये मुकेश को ।’ ऐसा कोई स्थान नहीं, जहाँ रेडियो नहीं पाया जाता हो । इसका कारण यह है कि रेडियो की कीमत बहुत अधिक नहीं है, कम-से-कम डेढ़ सौ रुपये में एक रेडियो सेट अवश्य मिल जाता है 
     

        रेडियो के संबंध में भारतीय वैज्ञानिक श्री जगदीशचन्द्र बसु ने पहलेअनेक परीक्षण किये, परंतु इसमें सफलता मिली इटली के वैज्ञानिक मार्कोनी को । मार्कोनी ने यह प्रमाणित किया कि आदमी जो कुछ बोलता है, वह ध्वनि तरंग बनकर हवा में तैरता रहता है, हमारी आवाज कभी मरती नहीं है । रेडियो हवा की तरंगों में फैली ध्वनि को बिजली की शक्ति से ग्रहण कर सुना देता है । जिस स्थान से ध्वनि का प्रसारण होता है, उसे रेडियो केन्द्र कहते हैं । इस प्रकार मार्कोनी ने सन् 1895 ई० में रेडियो का आविष्कार कर संसार की बहुत बड़ी सेवा की।

      रेडियो ने सिनेमा, ग्रामोफोन और समाचारपत्र तीनों को एक साथ मिलाकर आश्चर्यजनक काम किया। रेडियो द्वारा हम संगीत, नृत्य और नाटक का आनन्द एक साथ पाते हैं । अतः इनके लिए अब सिनेमा देखना बहुत जरूरी नहीं रहा । पहले गीतों के लिए हमें ग्रामोफोन का सहारा लेना पड़ता था । काफी खर्चकर गवैये बुलाने पड़ते थे । अब हम घर बैठे ही सभी प्रकार के गीत और संगीत का आनन्द उठाते हैं । बड़े-बड़े गायक हमारे सामने आते हैं और हम उनका गाना सुनते हैं । अब तो समाचारपत्र भी खरीदने की आवश्यकता नहीं रही । रेडियो द्वारा हम प्रतिदिन देश-विदेश के ताजा से ताजा समाचार 10-15 मिनट में सुन लेते हैं । इतना ही नहीं रेडियो ने अंतर्राष्ट्रीय संबंधों को मजबूत कर विश्वबंधुत्व को बढ़ावा दिया है । आधुनिक युद्धों में भी रेडियो का उपयोग होता है । रेडियो ने ज्ञान-विज्ञान की शिक्षा में भी काफी सहयोग किया है ।

           यह प्रतिदिन सभी तरह के लोगों की रुचि और आवश्यकतानुसार नयी-नयी बातों का प्रसारण करता है । गाँव वालों के लिए ‘पंचायत’ या ‘चौपाल’, महिलाओं के लिए ‘आंगन’, बच्चों के लिए ‘बाल-मंडल’ तथा किसान के लिए ‘कृषि चर्चा’ आदि कार्यक्रमों का प्रसारण हर दिन करता रहता है । इसी प्रकार स्कूली बच्चों और विश्वविद्यालयों के छात्रों के लिए भी विविध कायक्रमों की अलग-अलग व्यवस्था रहती है । इसमें कोई संदेह नहीं कि रेडियो आधुनिक जीवन के लिए अत्यंत उपयोगी और आवश्यक है।

       रेडियो के आकार और कार्य-प्रणाली में बहुत सुधार हुए हैं । पहले बड़े आकार का रेडियो होता था जिसके साथ एक बहुत बड़ी बैटरी के प्रयोग में लायी जाती थी । लम्बे और ऊँचे एरियल लगाने की आवश्यकता थी । लेकिन अब तो मामूली टार्च बैटरी के प्रयोग से ही यह काम करने लगता है । शहरों और देहातों में एक ही रेडियो काम करता है । उसकी आंतरिक रचना में ऐसा परिवर्तन लाया गया है कि इसे बैटरी और विद्युत् परिपथ दोनों से बजाया जा सकता है । आकार में तो रेडियो ऐसा छोटा हो गया है कि उसे आप जेब में भी रख लें तो किसी को पता न चले ।

          पहले के रेडियो को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाने में कठिनाई होती थी । स्थिर स्थान पर एक जगह रखकर ही उसे सुना जा सकता था, लेकिन अब ऐसी बात नहीं रही । अब तो रेलगाड़ी, मोटरगाड़ी आदि में सफर करते समय भी रेडियो द्वारा समाचार और गाने सुने जा सकते हैं । न तार हिलने का डर और न एरियल की आवश्यकता । इसे विज्ञान की अनुपम देन ही कहा जा सकता है । रेडियो का उपयोग अनन्त है । यह दुनिया के देशों को एक करने में, शिक्षा-प्रसार में, विविध मनोरंजन के प्रसार में और अंतर्राष्ट्रीय नागरिक जीवन  को मजबूत बनाने में बड़ी सहायता कर रही है । इसे आधुनिक विज्ञान का बहुत बड़ा वरदान कहा जा सकता है ।

(घ) भारत में श्वेत क्रान्ति

भारतीय कृषि एवं पशुपालन एक-दूसरे के अभिन्न अंग रहे हैं। यदि कृषि में विकास होगा तो पशुपालन में भी विकास होगा, अतः एक नजर कृषि के वर्तमान विकास, समस्याओं आदि पर डालना आवश्यक है ।

              भारतीय कृषि की उत्पादकता विगत दशकों में बहुत नाटकीय ढंग से बढी, विशेष रूप से सिंचित दशाओं में धान्य उत्पादन (धान, गेहूँ) की उल्लेखनीय प्रगति, जिसे कृषि में ‘हरित क्रांति’ (Green Revolution) कहा गया, लेकिन इसी से संतुष्ट नहीं होना चाहिए, क्योंकि विगत 5-6 वर्षों में फसलों के उत्पादन एवं उत्पादकता में आनुपातिक गिरावट ही नहीं देखी गई बल्कि कुछ ठहराव (पड़ाव) भी देखने में आया है । ऐसी स्थिति में जनसंख्या वृद्धि को देखते हुए चिंता अवश्य हुई है, अतः कृषि वैज्ञानिकों के लिए यह चुनौती भरा प्रश्न है दूसरी ओर, खेती योग्य भूमि शहरीकरण के अंतर्गत आती जा रही है, जहाँ बहुमंजलीय इमारतें देखने को मिल रही हैं और कृषि को ऊबड़-खाबड़ एवं कम उपजाऊ वाली भूमियों की तरफ धकेला जा रहा है।

         सिंचाई की क्षमता (नहरों, नलकूपों, कुओं) में भी अब वृद्धि नहीं प्रतीत हो रहा है, जहाँ नहर से सिंचाई की जा रही है वहाँ भूमि में लगातार लवणीयता विकसित हो रही है तथा बिना जीवांश के अकार्बनिक उर्वरकों एवं रसायनों के लगातार प्रयोग ने भी प्रतिकूल असर डाला है। साथ ही, किसान के खेत की उपज एवं अनुसंधान केन्द्र की उपज में काफी गहरी खाई है, जिसे पाटना होगा ।

          भविष्य में खाद्यान्न उत्पादन का यह स्वरूप अधिक आशावान दिखाई नहीं पड़ रहा है, अतः अधिकतम उत्पादन में संसाधन और पर्यावरण चुनौती दे रहे हैं, उनके महत्त्व को प्राथमिकता देनी होगी । प्राकृतिक साधनों में कमी का आना, अधिक लागत एवं ऊर्जा उपयोग, वर्षा की कमी से एवं निरन्तर प्रतिवर्ष घटोत्तरी से भूमि के जल-स्तर में गिरावट का आना एवं भूमिगत पानी का रिचार्ज न होना, पर्यावरण में ह्रास आदि पर ध्यान देना होगा । यदि इन विषमताओं को भविष्य में दूर कर दिया जाए, तभी खाद्यान्न उत्पादन की गति और जनसंख्या वृद्धि में अनुरूपता लायी जा सकेगी, फलस्वरूप, समगतिशील खेती भी इन परिस्थितियों में संभव होगी । वास्तव में समगतिशील खेती है-‘मानव की बदलती हुई आवश्यकताओं की आपूर्ति हेतु कृषि में लगनेवाले संसाधनों का इस प्रकार सफल व्यवस्थित उपयोग किया जाना, ताकि प्राकृतिक साधनों का ह्रास न होने पाए और पर्यावरण भी सुरक्षित रहे’ जो आज की अत्यन्त आवश्यकता है।

         ठीक कृषि से जुड़ा एक डेयरी व्यवसाय (उद्योग)भी है जिन्हें साथ-साथ कन्धे-से-कन्धा मिलाकर साथ निभाना है। यह सच है कि बगैर खेती के डेयरी व्यवसाय संभव नहीं, क्योंकि पशुओं के लिए हरा एवं सूखा चारा, दाना, खल्ली, बिनौले आदि सभी खेती से ही मिलते हैं और इसके विपरीत, डेयरी उद्योग से खेती के लिए बैल, बछड़े, भैंसे आदि जानवर, गोबर एवं मलमूत्र की खादें आदि मिलती हैं । अतः दोनों व्यवसाय एक-दूसरे पर निर्भर हैं ।

            स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार मनुष्य को अनाज द्वारा पेट भरना ही काफी नहीं है, बल्कि संतुलित आहार लेना अनिवार्य है । शाकाहारी व्यक्तियों के लिए इसकी पूर्ति केवल दूध से ही संभव है, क्योंकि दूध को ही मानव का ‘पूर्ण
भोजन’ माना गया है वैसे आहार में चावल के बाद दूध का दूसरा स्थान है। अतः डेयरी उद्योग से ग्रामीणों की आमदनी बढ़ाना और व्यावसायिक दृष्टि से दुग्ध उत्पादन बढ़ाना, इस व्यवसाय का मुख्य लक्ष्य है । कहा जाता है कि प्राचीन काल में हमारे देश में दूध की नदियाँ बहा करती थीं, लेकिन बाद में दूध का उत्पादन धीरे-धीरे कम होता चला गया, जो एक चिंताजनक बात है
पुनः बढ़ाने हेतु प्रयास जरूरी है । दूध के क्षेत्र में क्रांति लाना ही ‘श्वेत क्रांति’ कहलाता है।

                         सर्वप्रथम, देश में सन 1889 में इलाहाबाद में ‘मिलिट्री डेयरी फार्म’ प्रारम्भ हुआ था और यहीं से 1931 में देश का सर्वप्रथम ‘दुग्ध सहकारी संघ’ आरंभ हुआ । आज देश के प्रायः सभी बड़े नगरों में दुग्ध सहकारी संघ स्थापित हो चुके हैं जो दूध को एकत्र करके संसाधित करते हैं और शहरों के उपभोक्ताओं को उचित मूल्य पर उपलब्ध कराते हैं । सहकारी संघ के नाते किसान एवं दूध-उत्पादकों को, जो समिति के सदस्य होते हैं, दूध के उचित मूल्य के अतिरिक्त पशुधन के विकास और स्वास्थ्य के लिए अनेक प्रकार के ऋण प्रदान किए जाते हैं

               2 अक्टूबर, 1952 से देश में सामुदायिक विकास कार्यक्रम शुरू किए गए, ताकि ग्रामीणों का सर्वांगीण विकास किया जा सके । इन कार्यक्रमों में पशुपालन के साथ-साथ कृषि, स्वास्थ्य तथा सफाई, आहार एवं पोषण, शिक्षा जनकल्याण कार्यक्रम, परिवहन एवं संचार साधनों की स्थापना, घरेलू दस्तकारी, ग्राम्य उद्योग आदि सभी शामिल थे । बाद में सन् 1964-65 में सघन पशु विकास प्रोग्राम चलाया गया, जिसके अन्तर्गत ‘धवल क्रांति अथवा श्वेत क्रांति’ लाने के लिए पशु मालिकों को पशुपालन के सुधरे तरीकों का पैकेज प्रदान किया गया । बाद में ‘श्वेत क्रांति’ की गति और तेज करने के लिए ‘ऑपरेशन फ्लड’ आरंभ किया गया ।

(ङ) राष्ट्रीय एकता और अखण्डता

राष्ट्रीय एकता और अखण्डता की नींव पर ही किसी राष्ट्र का भवन निर्मित हो सकता है। भारत जैसे राज्य के लिए जिसने अथक और निरन्तर प्रयत्नों के फलस्वरूप आजादी हासिल की है, यह प्रश्न और भी अधिक महत्त्वपूर्ण है । भावात्मक एकता राष्ट्रीय एकता की जड़ है और भावात्मक एकता की जड़ों का सिंचन सांस्कृतिक एकता के द्वारा होता है । सांस्कृतिक एकता के लिए अनिवार्य है

       भाषागत एकता । सच तो यह है कि भाषा केवल शब्दों का समूह ही नहीं है,बल्कि पारस्परिक सहयोग को पैदा करनेवाले विचारों का जादू है। इसमें वह रस मिलता है जो सुरापान के समान है और जो मनुष्य में एकता का नशा ला देता है । भाषा मानवीय एकता का एक प्रमुख माध्यम है और फलतः राष्ट्रीयता के विकास में एक प्रमुख तत्व । भारत में अनेक भाषाएँ बोली जाती हैं-असमिया, बंगला, उड़िया, तमिल, तेलगु, कन्नड़, और मलयालम, गुजराती, मराठी, उर्दू, पंजाबी, सिन्धी, कश्मीरी आदि । स्वतन्त्रता के पूर्व इन सभी भाषाओं ने एक स्वर से अपनी वाणी द्वारा राष्ट्रीय आंदोलन में सक्रिय योगदान किया था । स्वतन्त्रता के बाद आज देश के सामने सबसे बड़ा सवाल है-उसकी रक्षा करना जिसकी सबसे पहली शर्त है-राष्ट्रीय एकता ।

        आज भारत संक्रान्ति काल में गुजर रहा है । क्षेत्रवाद का दानव अपना विकराल रूप दिखा रहा है । सर्वधर्मसमभाव का अभाव और प्रादेशिक पूर्वाग्रह सुरसा-मुख बनाने जा रहा है । ठीक है कि ऐतिहासिक रूप से भारत में प्राचीन काल से ही क्षेत्रीय समुदायों का वैविध्य रहा है, परन्तु इस विविधता के बावजूद भारत सदैव एक सांस्कृतिक कुल के रूप में प्रतिष्ठित रहा है । भारतीय विचारकों ने इस तथ्य पर विशेष बल दिया है कि अपनी व्यापक संरचना के अन्तर्गत क्षेत्रीय विविधता को स्वीकार करने की क्षमता ही भारतीय संस्कृति की अखण्डता के नैरन्तर्य का मूल कारण है । ब्रिटिश साम्राज्यवाद ने भारतीय जन-जीवन की सर्वनिष्ठता की आधारशिला को क्षत-विक्षत कर दिया था, साथ ही, विभाजन और शासन करो’ की नीति के अन्तर्गत भारत के पूरे भूगोल को उन लोगों ने घृणित कर दिया । भारत से पाकिस्तान का जो विभाजन हुआ

               उसका दर्द अनुभव कर पाना सहज नहीं है । भारतरूपी सचेतन और सप्राणवान
शरीर से एक जीवन्त अंग काट कर । पाकिस्तान बनाया गया । आवश्यकता है कि राष्ट्रीय एकता को टूटने से बचाने के लिए क्षेत्रवाद की भावनाओं को सीमित किया जाए । इसके लिए सरकार को चाहिए कि अखिल भारतीय स्तर पर योजनाएँ बनाकर गरीबी और बेरोजगारी जैसे प्रश्नों का समाधान ढूँढे । भाषा और संस्कृति के प्रश्नों पर भी समुचित ध्यान दे। राज्य सरकारों को राष्ट्रीय विकास के संदर्भ में अपने प्रान्त के भीतर विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिए समुचित प्रोत्साहन एवं साधन दिये जाएँ । भारतीय संघवाद को कठोरता के साथ-साथ नमनीयता के सिद्धान्त का भी समादर करना चाहिए।

                    सम्प्रदायवाद किसी भी राष्ट्र के विभाजन का मूल कारण है । सम्प्रदायवाद
की पेंदी में धर्म का लेप लगा होता है । सम्प्रदायवाद विभिन्न समुदायों के मध्य कटुता और विरोध को जन्म देता है तथा धर्म का शोषण करता है और सत्ता राजनीति का कुचक्र तैयार करता है । परिणाम यह होता है कि एक ही राज्य और राजनीतिक व्यवस्था के अधीन बसे हुए लोग छितराये से प्रतीत होते हैं। इसके बाद आती है सांस्कृतिक गिरावट-जो एक अलग अस्तित्व की पहचान ढूँढ़ती है। भारत का संविधान धर्म-निरपेक्ष है । भारत का अपना कोई सरकारी अथवा राष्ट्रीय धर्म नहीं है किन्तु देश के भीतर विभिन्न सम्प्रदाय राष्ट्रीय एकता के लिए विघटन का कार्य कर रहे हैं । सभी सम्प्रदायों द्वारा अपने-अपने धर्मों
को एक दूसरे पर थोपने की कोशिश जारी है । क्षुद्र राजनीतिक स्वार्थी लोग के नाम पर साम्प्रदायिकता को उकसाते रहते हैं।

                   आजादी के पश्चात हम जिस मानसिकता से ग्रस्त रहे हैं, उसका वास्तविक व्यंग्य रहा है कि हम अन्तर्राष्ट्रीय होकर राष्ट्रीय समस्याओं से विमुख होते गये । राष्ट्रीय चेतना के तत्व धर्म-दंश से हम मुक्त नहीं करा सके हैं । भारत को आजाद कराने के लिए जाति, धर्म और क्षेत्र से हट कर अंग्रेजों को भारत से भगाने का संकल्प था, किन्तु आज लगता है कि राष्ट्र की समस्याओं के प्रति हमारा कोई संकल्प ही नहीं है और धर्म, जाति तथा क्षेत्र की संकीर्ण मानसिकता से हमारी व्यवस्था भोथरा गयी है जिसे एक नये संदर्भ की तलाश है । सांस्कृतिक चेतना राष्ट्रीय न होकर क्षेत्रीय रूप में विकसित हो रही है।
राष्ट्रीय एकता और अखण्डता के सम्बन्ध में एक विचारणीय तत्त्व है-भाषा । भावात्मक एकता हो या राष्ट्रीय एकता, उसका माध्यम भाषा ही होगी।

             भाषा का सीधा सम्बन्ध सम्प्रेषणीयता से है । भारत एक बहुभाषी राज्य है । आजादी के बाद भाषा की समस्या उभर कर सामने आयी। भाषायी सामंजस्य स्थापित करने के लिए हिन्दी को राजभाषा घोषित किया गया है । अंग्रेजी को सम्पर्क भाषा का दर्जा दिया गया है किन्तु पूरे देश में अंग्रेजी के जाननेवाले कितने हैं लगभग तीन प्रतिशत । हिन्दी के जाननेवालों की संख्या सर्वाधिक अर्थात 42% से अधिक है। अतः आवश्यकता है एक सर्वज्ञेय भाषा की, जो पूरे राष्ट्र की अभिव्यक्ति को अपने गर्भ में रख सके। भारत की सामूहिक चेतना ही राष्ट्रीय एकता की आधारभूमि है ।

 

4. अपने विद्यालय के प्रधानाचार्य को 5 दिन के अवकाश के लिए प्रार्थना-पत्र लिखिए।
अथवा
प्रदूषण की समस्या को केन्द्र में रखते हुए दो मित्रों के बीच संवाद लिखें।
उत्तर-

सेवा में,
           प्रधानाचार्य महोदय
           राममोहन राय सेमिनरी विद्यालय
           खजांची रोड, पटना
          विषय-5 दिन के अवकाश के लिए प्रार्थना-पत्र ।
श्रीमानजी,
                सविनय निवेदन है कि हमारा पूरा परिवार 5 दिन के लिए गोआ जा रहा है । अतः आपसे निवेदन है कि मुझे 20 जनवरी से 24 जनवरी तक का अवकाश प्रदान करें ताकि मैं गोआ-भ्रमण का आनंद उठा सकूँ । आपकी अति कृपा होगी ।

आपका आज्ञाकारी शिष्य

कक्षाय-दशम

विज कुमार

अथवा

दीपक: क्या हुआ अमर, तुम उदास क्यों हो ?
अमर :दीपक, मेरे पिताजी की हालत ठीक नहीं है ।
दीपक :क्यों ? क्या हुआ उन्हें ?
अमर :हमारे शहर में इतना प्रदूषण हो गया है जिसकी वजह से पिताजी आज अस्पताल में भर्ती हैं ।
दीपक : उन्हें तो सांस की बीमारी है ना ?
अमर : हाँ. दीपक शहर की जहरीली गैस ने पिताजी के शरीर में ऐसा घर कर लिया कि उन्हें अस्पताल में भर्ती कराना
पड़ा।
दीपक : हम छात्रों को प्रदूषण की समस्या का ठोस निदान निकालने के लिए सड़कों पर उतरना होगा, आंदोलन करना होगा । तभी लगता है सरकार जगेगी और शहर को प्रदूषण से मुक्ति मिल पाएगी ।
अमर: ठीक कहते हो मित्र ।

 

5. निम्नलिखित प्रश्नों में से किन्हीं पाँच प्रश्नों के उत्तर प्रत्येक लगभग 20-30 शब्दों में दें:

(क) खोखा किन मामलों में अपवाद था ?
उत्तर-खोखा जीवन के नियम का अपवाद तो था ही वह घर के नियमों का भी अपवाद था। वह शरारती और लापरवाह था। लाड़-प्यार में पलनेवाला-शरारती बिगडैल बच्चा था ।

(ख) देश की आजादी के लिए प्रयुक्त किन शब्दों की अर्थ मीमांसा लेखक करता है और लेखक के निष्कर्ष क्या हैं ?
उत्तर-देश की आजादी के लिए लेखक ने दो शब्दों की अर्थ मीमांसा प्रस्तुत किया है-इंडिपेण्डेन्स और दूसरा स्वाधीनता दिवस । इण्डिपेण्डेन्स का अर्थ है किसी की अधीनता का अभाव, पर स्वाधीनता शब्द का अर्थ है अपने
ही अधीन रहना । अंग्रेजी में कहना हो तो इसे सेल्फ डिपेण्डेन्स कह सकते हैं।

(ग) बहादुर के आने से लेखक के घर और परिवार के सदस्यों पर कैसा प्रभाव पड़ा?
उत्तर-बहादुर के लेखक के घर आने से उत्साहपूर्ण वातावरण हो गया । अपने हँसमुख स्वभाव और मेहनत के बल पर उसने सबका दिल जीत लिया था। लेकिन धीरे-धीरे घर के लोगों की आदतें बिगड़ती गयीं। घर के सभी लोग काहिल होने लगे। बहादुर की उपस्थिति से घर में खुशियों का महौल छा गया।

(घ) नदी तट पर बैठे हुए लेखक को क्या अनुभव होता है ?
उत्तर-नदी तट पर बैठे हुए लेखक को अनुभव होता है कि नदी के तट पर बैठना एक तरह से नदी के साथ बहने जैसा है। कभी-कभी तो ऐसा प्रतीत होता है कि नदी का जल स्थिर है और तट ही बह रहा है। दरअसल नदी के पास होना नदी होने जैसा ही होना है।

(ङ) कवि ने माली-मालिन किन्हें और क्यों कहा है ?
उत्तर-कवि ने माली-मालिन श्रीकृष्ण और राधा को कहा है क्योंकि प्रेम रूपी वाटिका के ये दोनों ही माली और मालिन हैं। माली वाटिका को सुंदर बनाये रखने के लिए अपने जीवन की अमूल्य निधि को समर्पित कर देता है। तन-मन सर्वस्व अर्पण करने वाला वाटिका को ही अमर प्रेमिका मानता है । कृष्ण-अपनी वाटिका अर्थात् राधा को सर्वस्व अर्पण कर देते हैं।

(च) कवि की दृष्टि में आज के देवता कौन हैं और वे कहाँ मिलेंगे?
उत्तर-कवि की दृष्टि में आज के देवता कठोर परिश्रम करने वाले मजदूर और किसान हैं। वे पत्थर तोड़ते हुए खेत-खलिहानों में काम करते हुए मिलेंगे। भारत की आत्मा गाँवों में बसती है। किसान ही भारत के मेरुदंड हैं। जेठ की दुपहरी हो या कड़ाके की सर्दी या फिर मूसलाधार वर्षा सभी में वे बिना थके हुए खेत-खलिहानों में डटे हुए मिलते हैं।

(छ) घर, शहर और देश के बाद कवि किन चीजों को बचाने की बात करता है और क्यों ?
उत्तर-घर, शहर और देश के बाद कवि नदी, हवा आदि को बचाने की करता है। बदलते परिवेश में प्रदूषण की समस्या गंभीर होती रही है। वातावरण के प्रदूषित होने से जन-जीवन प्रभावित हो रहा है। नदियों का जलस्तर घट रहा है। हवा में जहरीली गैसें घुल-मिल रही हैं। जंगल कटने से मरुस्थल फैलता जा रहा है

(ज) कवि अपने को जलपात्र और मदिरा क्यों कहता है ?
उत्तर-कवि भलीभाँति जानता है कि भक्त और भगवान दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं । ये पृथक् नहीं किये जा सकते हैं । मदिरापान करनेवाला जलपात्र अपने साथ अवश्य रखता है। जलपत्र के बिना मदिरापान कैसे किया जा सकता है। ठीक उसी प्रकार, भगवान की गुणगाथा भक्त के बिना कैसे गायी जा सकती है। इसी कारण कवि अपने आप को जलपात्र और मदिरा कहता है ।

(झ) लेखक ने कहानी का शीर्षक ‘नगर’ क्यों रखा ? स्पष्ट करें।
उत्तर-नगर कहानी में नगरीय व्यवस्था का चित्रण किया गया है। एक रोगी जो इलाज के लिए गाँव से नगर आता है किन्तु अस्पताल प्रशासन उसका टालमटोल कर देता है। उसकी भर्ती नहीं हो पाती है। नगरीय व्यवस्था से क्षुब्ध होकर ही इस कहानी का शीर्षक ‘नगर’ रखा गया है।

(ञ) सीता अपने ही घर में घुटन क्यों महसूस करती है ?
उत्तर-सीता के पति के मरते ही घर की स्थिति दयनीय हो गई। बेटों में आपसी भेद उत्पन्न हो गये । वे केवल अपनी पत्नी और संतान में ही सिमट गये हैं। बहुओं की कड़वी बातें उसे चुभती रहती हैं। अपनी ही संतान से वह विक्षुब्ध हो गई है। अपने मन की व्यथा किसी से वह कह नहीं सकती है। यही कारण है कि अपने ही घर में वह घुटन महसूस करती है ।

 

6. निम्नलिखित प्रश्नों में से किसी एक प्रश्न का उत्तर लिखिए (शब्द सीमा लगभग 100):

(क) बहादुर कहानी के शीर्षक की सार्थकता स्पष्ट कीजिए। लेखक ने इसका शीर्षक नौकर क्यों नहीं रखा?
उत्तर-जहाँ तक शीर्षक की सार्थकता का प्रश्न है वह स्वयं में सटीक है, यथार्थ के साथ है । कहानी बहादुर के इर्द-गिर्द ही चक्कर काटती है क्योंकि कहानी का केन्द्र-बिन्दु बहादुर ही है । बहादुर का जैसा नाम वैसा काम । वह नेपाल का वासी है । नेपाली लोगों का नस्लीय संस्कार है कि वे कभी भी झूठ नहीं बोलेंगे, न चोरी करेंगे । बहादुर नेपाल की संस्कृति को अपने आप में समेटे हुए है। इस प्रकार कहानी का शीर्षक ‘बहादुर’ सही शीर्षक है। इस कहानी में बहादुर के चरित्र का चित्रण हुआ है और उसके व्यक्तित्व की विशेषताएँ साफ-साफ दृष्टिगत होती हैं। दूसरी तरफ इस कहानी का शीर्षक लेखक ने नौकर इसलिए नहीं रखा कि नौकर से यथार्थता का बोध पूर्णरूपेण नहीं होता। नौकर नाम से वह स्निग्धता और यथार्थता नहीं झलकती जो बहादुर नाम से चरितार्थ होती है ‘नौकर’ शब्द में विराटता और उदात्तता के दर्शन नहीं होते । बहादुर एक खास कौम का द्योतक है। भारतीय इतिहास ही नहीं नेपाली और विश्व के इतिहासb में गोरखा बहादुरों की वीरता, ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठता का काफी जिक्र है। इस प्रकार नौकर नाम से इस कहानी की सार्थकता सिद्ध नहीं होती जो बहादुर नाम से चरितार्थ होती है। अत: ‘बहादुर’ शीर्षक स्वयं में सार्थक है, यथार्थपरक है।

(ख) निम्न पंक्तियों का अर्थ लिखें
सदियों की ठंडी-बुझी राख सुगबुगा उठी,
मिट्टी सोने का ताज पहन इठलाती है,
दो राह, समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो,
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।
उत्तर-सदियों से भारत पराधीनता की बेड़ियों में आबद्ध था । आज हम स्वाधीनता की लड़ाई में विजयी हुए हैं । एक नये लोकतंत्र का जन्म हो रहा है । हमारी चेतना जो युगों-युगों से पराधीनता के कारण सो गयी थी, लेकिन उसकी चिनगारी राख की बुझी ढेरी में तप्त थी, उसने आज अपने विकराल रूप को धारण कर लिया है । सुषुप्त चेतना के जाग्रत रूप की चर्चा कवि ने अपनी कविता में किया है, उसी कविता द्वारा इसकी महत्ता का गुणगान आज हो रहा है । हम जग गए हैं । लोकतंत्र का अभ्युदय हुआ है ।

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